भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 1100
१०८६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| न्तस्ते । तस्मादायुष्कामेन आयुर्गुणेनोपास्यं ब्रह्मेत्यर्थः ॥१६॥ | हैं। अतः तात्पर्य यह है कि जिसे आयुकी इच्छा हो वह ब्रह्मकी आयुरूप गुणके द्वारा उपासना करे ॥ १६ ॥ |

सर्वाधारभूत ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ

किं च—तथा—

यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः ।
तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ १७ ॥

जिसमें पाँच पञ्चजन और [ अव्याकृतसंज्ञक ] आकाश भी प्रतिष्ठित है, उस आत्माको ही मैं अमृत ब्रह्म मानता हूँ। उस ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ ॥ १७ ॥

| यस्मिन् यत्र ब्रह्मणि, पञ्च पञ्चजनाः—गन्धर्वादयः पञ्चैव संख्याता गन्धर्वाः पितरो देवा असुरा रक्षांसि—निषादपञ्चमा वा वर्णाः; आकाशश्च अव्याकृताख्यः—यस्मिन् सूत्रम् ओतं च प्रोतं च—यस्मिन् प्रतिष्ठितः; “एतस्मिन् नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाशः” ( ३।८।११ ) इत्युक्तम्; तमेव आत्मानम् अमृतं ब्रह्म मन्ये अहम्, न चाहमात्मानं ततोऽन्यत्वेन जाने । किं तर्हि ? अमृतोऽहं ब्रह्म विद्वान् सन्; अज्ञानमात्रेण तु मर्त्योऽहमासम्; तदपगमाद् विद्वानहममृत एव ॥ १७ ॥ | जिसमें—जिस ब्रह्ममें पाँच पञ्चजन—गन्धर्वादि, क्योंकि गंधर्व पितर, देव, असुर और राक्षस—इस प्रकार वे पाँच ही गिने गये हैं, अथवा निषाद जिनमें पाँचवाँ है, वे ब्राह्मणादि वर्ण तथा अव्याकृतसंज्ञक आकाश, जिसके विषयमें 'जिसमें सूत्र ओतप्रोत है' ऐसा कहा गया है, ये सब जिसमें प्रतिष्ठित हैं, “हे गार्गि ! इस अक्षरमें ही आकाश ओतप्रोत है” ऐसा पहले कहा भी गया है, उस आत्माको ही मैं अमृत ब्रह्म मानता हूँ, उससे भिन्नरूपसे मैं आत्माको नहीं जानता। तो फिर क्या हुआ ?—उस ब्रह्मको जाननेवाला होनेसे मैं अमृत हूँ, मैं अज्ञानमात्रसे ही मरणधर्मा था, उसकी निवृत्ति हो जानेसे मैं ब्रह्मवेत्ता अमृत ही हूँ ॥ १७ ॥ |