बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1106, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| तमीदृशमात्मानमेव, धीरो धीमान् विज्ञाय उपदेशतः शास्त्रतश्च, प्रज्ञां शास्त्राचार्योपदिष्टविषयां जिज्ञासापरिसमाप्तिकरीम्, कुर्वीत ब्राह्मणः—एवं प्रज्ञाकरणसाधनानि संन्यासशमदमोपरमतितिक्षासमाधानानि कुर्यादित्यर्थः ।<br><br>न अनुध्यायात्—नानुचिन्तयेत्, बहून् प्रभूतान् शब्दान्; तत्र बहुत्वप्रतिषेधात् केवलात्मैकत्वप्रतिपादकाः स्वल्पाः शब्दा अनुज्ञायन्ते, "ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्" (मु० उ० २ । २ । ६) "अन्या वाचो विमुञ्चथ" (मु० उ० २ । २ । ५) इति च आथर्वणे । वाचो विग्लापनं विशेषेण ग्लानिकरं श्रमकरम्, हि यस्मात्, तद् बहुशब्दाभिध्यानमिति ॥ २१ ॥ | धीर अर्थात् बुद्धिमान् ब्राह्मण उस ऐसे आत्माको ही आचार्यके उपदेश और शास्त्रसे जानकर, शास्त्र और आचार्यने जिसके विषयका उपदेश किया है तथा जो जिज्ञासाकी सर्वथा समाप्ति कर देनेवाली है, ऐसी प्रज्ञा (बुद्धि) करे। तात्पर्य यह है कि इस प्रकारकी प्रज्ञा उत्पन्न करनेके साधन संन्यास, शम, दम, उपरति, तितिक्षा और समाधिका पालन करे।<br><br>बहुत-से शब्दोंका अनुध्यान—अनुचिन्तन न करे। यहाँ बहुत्वका प्रतिषेध करनेसे केवल आत्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवाले थोड़े-से शब्दोंके अनुशीलनके लिये अनुमति सूचित होती है। आथर्वणश्रुतिमें भी कहा है—"आत्माका ॐ इस प्रकार ध्यान करे", "अन्य वाणीका त्याग करो" इत्यादि। क्योंकि वह अधिक शब्दोंका अनुध्यान वाणीका विग्लापन—विशेषरूपसे ग्लानि करनेवाला अर्थात् श्रम उत्पन्न करनेवाला है ॥ २१ ॥ |
आत्माके स्वरूप, उसकी उपलब्धिके साधनभूत संन्यास और आत्मज्ञकी स्थितिका प्रतिपादन
| सहेतुकौ बन्धमोक्षावभिहितौ मन्त्रब्राह्मणाभ्याम्; श्लोकैश्च पुन- | मन्त्र और ब्राह्मण दोनोंके द्वारा बन्ध और मोक्षका कारणसहित निरूपण किया गया; फिर मन्त्रोंके |
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