बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1109, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९५
हर्ष) प्राप्त नहीं होते। अतः इस निमित्तसे मैंने पाप किया है [—ऐसा पश्चात्ताप] और इस निमित्तसे मैंने पुण्य किया है [ऐसा हर्ष]—इन दोनोंको ही वह पार कर जाता है। इसे किया हुआ और न किया हुआ नित्यकर्म [फलप्रदान और प्रत्यवायके द्वारा] ताप नहीं देता ॥ २२ ॥
| स इति उक्तपरामर्शार्थः कोऽसावुक्तः परामृश्यते ? तं प्रतिनिर्दिशति—य एष विज्ञानमय इति । अतीतानन्तरवाक्योक्तसंप्रत्ययो मा भूदिति, य एषः। कतम एषः ? इत्युच्यते—विज्ञानमयः प्राणेष्विति । | 'सः' यह शब्द पूर्वोक्तके परामर्शके लिये है। वह पूर्वोक्त कौन है जिसका श्रुति परामर्श करती है ? 'य एष विज्ञानमयः' ऐसा कहकर श्रुति उसका प्रतिनिर्देश करती है। पूर्वोक्त मन्त्रके पहलेवाले ^१वाक्यमें कहे हुए आत्माको ही न समझ लिया जाय, इसलिये 'य एषः' (जो यह) ऐसा कहा है। यह कौन सा ? सो 'विज्ञानमयः प्राणेषु' इस वाक्यसे कहा जाता है। | | उक्तवाक्योल्लिङ्गनं संशयनिवृत्त्यर्थम्, उक्तं हि पूर्वं जनकप्रश्नारम्भे 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' (४ । ३ । ७) इत्यादि । एतदुक्तं भवति—योऽयम् 'विज्ञानमयः प्राणेषु' इत्यादिना वाक्येन प्रतिपादितः स्वयंज्योतिरात्मा, स एष कामकर्माविद्यानामनात्मधर्मत्वप्रतिपादनद्वारेण | यहाँ पूर्वोक्त वाक्यका उल्लेख संशयनिवृत्तिके लिये है। पहले जनकके प्रश्नके आरम्भमें 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' इत्यादि कहा है। यहाँ कहना यह है कि 'विज्ञानमयः प्राणेषु' इत्यादि वाक्यसे जिस स्वयंज्योति आत्माका प्रतिपादन किया गया है, उस इस आत्माको 'काम, कर्म और अविद्या—ये अनात्माके धर्म हैं' |
१. बीसवें मन्त्रके 'विरजः पर आकाशात्' इत्यादि वाक्यमें ।