बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1119, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1119
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थं [११०५
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मेव लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति' | लोककी इच्छा करनेवाले संन्यास करते हैं' ऐसा निश्चय करना ठीक ही हे । |
| इति युक्तमवधारणम् । | |
| आत्मलोकप्राप्तिर्हि अविद्यानिवृत्तौ स्वात्मन्यवस्थानमेव, तस्मादात्मानं चेल्लोकमिच्छति यः, तस्य सर्वक्रियोपरम एव आत्मलोकसाधनं मुख्यमन्तरङ्गम्, यथा पुत्रादिरेव बाह्यलोकत्रयस्य । पुत्रादिकर्मण आत्मलोकं प्रति असाधनत्वात् । असंभवेन च विरुद्धत्वमवोचाम। | अविद्याकी निवृत्ति होनेपर स्वात्मामें स्थित होना ही आत्मलोककी प्राप्ति है, अतः जिसे आत्मलोककी ही इच्छा है, उसके लिये सम्पूर्ण क्रियाओंसे उपरत होना ही आत्मलोकका मुख्य एवं अन्तरङ्ग साधन है, जिस प्रकार कि बाह्य तीनों लोकोंका साधन पुत्रादि ही हैं। पुत्रादि कर्म आत्मलोकके साधन नहीं हैं तथा पुत्रादि कर्म और संन्यास दोनोंका एक साथ होना असम्भव है — इसलिये हम इन्हें परस्परविरुद्ध बतलाते हैं। |
| तस्मादात्मानं लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्त्येव, सर्वक्रियाभ्यो निवर्तेरन्नेवेत्यर्थः । यथा च बाह्यलोकत्रयार्थिनः प्रति नियतानि पुत्रादीनि साधनानि विहितानि, एवमात्मलोकार्थिनः सर्वैषणानिवृत्तिः पारिव्राज्यं ब्रह्मविदो विधीयत एव । | अतः आत्मलोककी इच्छा करनेवाले परिव्राजक हो ही जायें, अर्थात् उन्हें सम्पूर्ण क्रियाओंसे निवृत्त हो ही जाना चाहिये। जिस प्रकार बाह्य तीनों लोकोंकी इच्छावालोंके लिये पुत्रादि नियत साधनोंका विधान किया गया है, इसी प्रकार आत्मलोकके इच्छुक ब्रह्मवेत्ताके लिये सम्पूर्ण एषणाओंकी निवृत्तिरूप पारिव्राज्य (संन्यास) का विधान है ही। |
बृ० उ० ७०—