बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1130, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें१११६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| अपुण्यं कर्म अकरवं कृतवानस्मि, कष्टं खलु मम वृत्तम्, अनेन पापेन कर्मणा अहं नरकं प्रतिपत्स्ये'—इति योऽयं पश्चात् पापं कर्म कृतवतः—परितापः स एनं नेति नेत्यात्मभूतं न तरति । | कारण मैंने पाप—अपुण्य कर्म किया, यह मेरे लिये बड़े ही क्लेशका कारण हुआ, इस पापकर्मके कारण मैं नरकको प्राप्त होऊँगा'—इस प्रकार जिसने पापकर्म किया है, उस पुरुषका जो यह पश्चात्ताप है, वह इस 'नेति-नेति' इस श्रुतिसे वर्णित आत्मस्वरूपको प्राप्त हुए पुरुषको नहीं प्राप्त होता । | | तथा—'अतः कल्याणं फलविषयकामानिमित्ताद् यज्ञदानादिलक्षणं पुण्यं शोभनं कर्म कृतवानस्मि, अतोऽहमस्य फलं सुखमुपभोक्ष्ये देहान्तरे' इत्येषोऽपि हर्षस्तं न तरति । उभे उ ह एव एष ब्रह्मविदेते कर्मणी तरति पुण्यपापलक्षणे । एवं ब्रह्मविदः संन्यासिन उभे अपि कर्मणी क्षीयेते—पूर्वजन्मनि कृते ये ते, इह जन्मनि कृते ये ते च; अपूर्वे च नारभ्येते । | इसी प्रकार [ दूसरी बात यह है— ] 'अतः—इस फलविषयक कामनारूप निमित्तसे मैंने कल्याण-यज्ञ-दानादिरूप पुण्य अर्थात् शुभ कर्म किया है, इसलिये मैं दूसरे शरीरमें इसका फलरूप सुख भोगूँगा'—इस प्रकारका हर्ष भी उसे नहीं प्राप्त होता। यह ब्रह्मवेत्ता इन पाप-पुण्यरूप दोनों ही प्रकारके कर्मोंसे पार हो जाता है। इस प्रकार ब्रह्मवेत्ता संन्यासीके जो पूर्वजन्ममें किये होते हैं, वे और जो इस जन्ममें किये होते हैं वे—दोनों ही प्रकारके कर्म क्षीण हो जाते हैं तथा नये कर्मोंका भी आरम्भ नहीं होता । | | किं च नैनं कृताकृते—कृतं नित्यानुष्ठानम्, अकृतं तस्यैव अक्रिया, ते अपि कृताकृते एनं | इसी प्रकार इसे कृत और अकृत-कृत नित्यानुष्ठानको कहते हैं और अकृत उसे न करनेको—वे कृत |