भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1145, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1145

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३१


| सा एवमुक्ता उवाच मैत्रेयी— सर्व्वेयं पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्, नु किं स्याम्, किमहं वित्तसाध्येन कर्मणा अमृता, आहो न स्यामिति । नेति होवाच याज्ञवल्क्य इत्यादि समानमन्यत् ॥ | इस प्रकार कहे जानेपर उस मैत्रेयीने कहा, 'यदि यह सारी पृथिवी धनसे पूर्ण हो जाय तो क्या उस धनसाध्य कर्मसे मैं अमर हो जाऊँगी अथवा नहीं ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'नहीं' इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३-४ ॥ |


याज्ञवल्क्यजीका सान्त्वनापूर्वक समाधान

स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियमवृधद्धन्त तर्हि भवत्येतद् व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ५ ॥

उन याज्ञवल्क्यजीने कहा, 'निश्चय ही तू पहले भी हमारी प्रिया रही है और इस समय भी तूने हमारे प्रिय (प्रसन्नता) को बढ़ाया है। अतः हे देवि ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तेरे प्रति इस ( अमृतत्वके साधन ) की व्याख्या करूँगा। तू मेरे व्याख्या किये हुए विषयका चिन्तन करना' ॥ ५ ॥

| स ह उवाच—प्रियैव पूर्वं खलु नः—अस्मभ्यं भवती, भवन्ती सती, प्रियमेव अवृधद् वर्धितवती निर्धारितवती असि; अतस्तुष्टोऽहम्, हन्त इच्छसि चेदमृतत्वसाधनं ज्ञातुम्, हे भवति, ते तुभ्यं तदमृतत्वसाधनं व्याख्यास्यामि ॥ ५ ॥ | उन्होंने कहा, तू निश्चय ही पहले भी हमारी प्रिया रही है, अब भी तूने हमारे प्रियकी ही वृद्धि की है, प्रसन्नताको ही बढ़ाया है—संतोषजनक निश्चय किया है, इसलिये मैं तुझपर प्रसन्न हूँ। अब यदि तू अमृतत्वका साधन जानना चाहती है तो हे भवति--हे देवि ! मैं तेरे प्रति उस अमृतत्वके साधनकी व्याख्या करूँगा ॥ ५ ॥ |