भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 115

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९


संस्कृतहिन्दी
परमात्मारूयं विद्याविषयम् अनामरूपकर्मात्मकम् "नेति नेति" (२।३।६) इति इतरप्रत्याख्यानेनोपसंहरिष्यति पृथक्। यस्तु वागादिसमाहारोपाधिपरिकल्पितः संसार्थ्यात्मा तं च वागादिसमाहारपक्षपातिनमेव दर्शयिष्यति "एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति" (२।४।१२) इति। तस्माद्युक्ता वागादीनामेव ज्ञानकर्मकर्तृत्वफलप्राप्तिविवक्षा।आगे जो नाम, रूप और कर्मसे रहित परमात्मसंज्ञक विद्याका विषय है उसका "नेति नेति" इस वाक्यद्वारा परमात्मेतर वस्तुका बाध करके अलग ही उपसंहार करेगी। और जो वागादिसंघातरूप उपाधिसे कल्पित संसारी आत्मा है उसे "इन भूतोंसे उत्पन्न होकर वह इन्हींके नाशके साथ नष्ट हो जाता है" इस वाक्यद्वारा वागादि संघातका पक्षपाती ही प्रदर्शित करेगी। अतः वागादिको ही ज्ञान और कर्मका कर्तृत्व है तथा उन्हें ही उनके फलकी प्राप्ति होती है—ऐसी विवक्षा उचित ही है।
तथेति तथास्त्विति देवैरुक्ता वाक्तेभ्योऽर्थिभ्योऽर्थाय उद्गायदुद्गानं कृतवती। कः पुनरसौ देवेभ्योऽर्थाय उद्गानकर्मणा वाचा निर्वर्तितः कार्यविशेषः? इत्युच्यते—यो वाचि निमित्तभूतायां वागादिसमुदायस्य य उपकारो निष्पद्यते वदनादिव्यापारेण, स एव। सर्वेषां ह्यसौ वाग्वदनाभिनिर्वृत्तो भोगः फलम्।देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वाक्ने 'तथा'—तथास्तु (ऐसा ही हो) यह कहकर उन प्रार्थी देवताओंके लिये उद्गान किया। किंतु इस उद्गानकर्मके द्वारा वाणीसे देवताओंके लिये कौन-सा कार्यविशेष निष्पन्न हुआ? सो बतलाते हैं। वाणीके निमित्तभूत होनेपर उसके भाषणादि व्यापारद्वारा वागादि समुदायका जो उपकार होता है वही उनका कार्यविशेष है। उन सबको वाणीके भाषणसे होनेवाला यह भोगरूप फल ही प्राप्त होता है।