बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1152, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १३ ॥
उसमें [ छठा ] दृष्टान्त इस प्रकार है—जिस प्रकार नमकका डला अन्तर और बाह्यसे रहित सम्पूर्ण रसघन ही है, हे मैत्रेयि ! उसी प्रकार यह आत्मा अन्तर-बाह्य-भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ही है । यह इन भूतोंसे [ विशेषरूपसे ] उत्थित होकर उन्हींके साथ नष्ट हो जाता है । इस प्रकार मर जानेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती । हे मैत्रेयि ! इस प्रकार मैं कहता हूँ—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १३ ॥
| सर्वकार्यप्रलयेऽविद्यानिमित्ते सैन्धवघनवदनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एक आत्मावतिष्ठते पूर्वं तु भूतमात्रासंसर्गविशेषाल्लब्धविशेषविज्ञानः सन्, तस्मिन् प्रविलापिते विद्यया विशेषविज्ञाने तन्निमित्ते च भूतसंसर्गे न प्रेत्य संज्ञा अस्ति—इत्येवं याज्ञवल्क्येनोक्ता ॥ १३ ॥ | अविद्याजनित सम्पूर्ण कार्यका सर्वथा लय हो जानेपर लवणखण्डके समान अन्तर और बाह्यसे रहित परिपूर्ण, प्रज्ञानघन एक आत्मा ही स्थित रहता है । पहले तो वह भूतमात्राके संसर्गविशेषसे विशेष विज्ञानको प्राप्त रहता है, फिर विद्याके द्वारा उस विशेष विज्ञान और उससे होनेवाले भूतमात्रके संसर्गके सर्वथा लीन कर दिये जानेपर मरणके पश्चात् उसकी संज्ञा नहीं रहती—ऐसा याज्ञवल्क्यने मैत्रेयीके प्रति कहा ॥ १३ ॥ |
निर्विशेष आत्माके विषयमें मैत्रेयीकी शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान
सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान् मोहान्तमापीपिपन्न वा अहममं विजानामीति स होवाच न वा