भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1159, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1159

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
एवं व्युत्थानविकल्पक्रमयथेष्टाश्रमप्रतिपत्तिप्रतिपादकानि हि श्रुतिस्मृतिवाक्यानि शतश उपलभ्यन्त इतरेतरविरुद्धानि। आचारश्च तद्विदाम्, विप्रतिपत्तिश्च शास्त्रार्थप्रतिपत्तॄणां बहुविदामपि। अतो न शक्यते शास्त्रार्थो मन्दबुद्धिभिर्विवेकेन प्रतिपत्तुम्। परिनिष्ठितशास्त्रन्यायबुद्धिभिरेव ह्येषां वाक्यानां विषयविभागः शक्यतेऽवधारयितुम्। तस्मादेषां विषयविभागज्ञापनाय यथाबुद्धिसामर्थ्यं विचारयिष्यामः।इस प्रकार व्युत्थानके विकल्प, क्रम और यथेष्ट आश्रमोंमें प्रवेश करनेका प्रतिपादन करनेवाले एक-दूसरेसे विरुद्ध सैकड़ों श्रुति-वचन और स्मृति-वाक्य देखे जाते हैं। श्रुति-स्मृतियोंके ज्ञाताओंके आचार भी विभिन्न हैं तथा [जैमिनिप्रभृति] शास्त्रमर्मज्ञोंमें बहुज्ञ होनेपर भी मतभेद देखा जाता है। अतः मन्द-बुद्धि पुरुषोंके लिये विवेकपूर्वक शास्त्रका मर्म समझना असम्भव है। जिनकी बुद्धि शास्त्र और युक्तिमें सब प्रकार निष्णात है, वे ही इन वाक्योंके विषयविभागका निर्णय कर सकते हैं। अतः इनके विषय-विभागको सूचित करनेके लिये हम अपनी बुद्धि और सामर्थ्यके अनुसार विचार करेंगे।
[पूर्वपक्षोत्थापनम्]<br>'यावज्जीव' श्रुत्यादिवाक्यानामन्यार्थासम्भवात् क्रियावसान एव वेदार्थः। "तं यज्ञपात्रैर्दहन्ति" इत्यन्त्यकर्मश्रवणाज्जरामर्यश्रवणाच्च लिङ्गाच्च "भस्मान्तँ शरीरम्" (बृ० उ० ५। १५। १) इतिपूर्व०—'यावज्जीवन अग्निहोत्र करे' इत्यादि वाक्योंका कोई दूसरा अर्थ न हो सकनेके कारण वेदका तात्पर्य कर्ममें ही समाप्त होनेवाला है। यह बात "उस (अग्निहोत्री) को यज्ञपात्रोंके सहित भस्म करते हैं" इस प्रकार अग्निहोत्रीके अन्त्येष्टि-कर्ममें यज्ञपात्रकी आवश्यकताका श्रवण होनेसे, जरा-मरणपर्यन्त अग्निहोत्रका विधान होनेसे तथा "शरीर भस्मान्त है" ऐसा गार्हस्थ्यसूचक लिङ्ग होनेसे भी ज्ञात