बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1162, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| पारिव्राज्यक्रमविधानस्यानवकाशत्ववारणम्<br><br>—जीवविध्यपवादत्वात् । यावज्जीवाग्निहोत्रादिविधेर्विश्वजित्सर्वमेधयोरेवापवादः, तत्र च क्रमप्रतिपत्तिसम्भवः 'ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद् गृहाद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत्' इति । | भर अग्निहोत्र करनेकी विधिका यह क्रमविधायक वचन अपवाद (बाधक) है [ अतः व्यर्थ नहीं है ] । यावज्जीवन अग्निहोत्रादिकी जो विधि है, उसका विश्वजित् और सर्वमेध यज्ञमें ही अपवाद है¹ इसलिये वहाँ 'ब्रह्मचर्य समाप्त करके गृहस्थ बने और गृहस्थसे वनवासी होकर परिव्राजक हो' ऐसी आश्रमोंकी क्रमशः प्रतिपत्ति सम्भव है । | | विरोधानुपपत्तेः— न ह्येवंविषयत्वे पारिव्राज्यक्रमविधानवाक्यस्य कश्चिद् विरोधः क्रमप्रतिपत्तेः । अन्यविषयपरिकल्पनायां तु यावज्जीवविधानश्रुतिः स्वविषयात् संकोचिता स्यात् । क्रमप्रतिपत्तेस्तु विश्वजित्सर्वमेधविषयत्वान्न कश्चिद् बाधः । | इस प्रकार उन वाक्योंमें कोई विरोध नहीं आ सकता—पारिव्राज्यके क्रमका विधान करनेवाले वाक्यका ऐसा विषय मान लेनेपर क्रमप्रतिपत्तिका कोई विरोध नहीं रहता । उसका कोई अन्य विषय कल्पना करनेपर तो यावज्जीवन कर्मका विधान करनेवाली श्रुतिका अपने विषयसे संकोच कर देना होगा । क्रमप्रतिपत्तिका विषय तो विश्वजित् और सर्वमेध यज्ञ हैं, इसलिये उसका कोई बाध नहीं होता । | | परमतनिराकरणपूर्वकं स्वमतस्थापनम्<br><br>न, आत्मज्ञानस्यामृतत्वहेतुत्वाभ्युपगमात् । यत् तावत् 'आत्मेत्येवो- | **सिद्धान्ती—**ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि आत्मज्ञानको अमृतत्वका हेतु माना गया है । 'आत्मेत्येवोपासीत' |
१. क्योंकि विश्वजित् और सर्वमेध—इन दो यज्ञोंमें सर्वस्व दान कर दिया जाता है, इसलिये फिर अग्निहोत्रादि कर्मकी सामग्री न रहनेसे उनका होना असम्भव हो जाता है। अतः उन यज्ञोंमेंसे किसीका अनुष्ठान करनेवालेके लिये ही अन्याश्रममें जानेकी विधि है—ऐसा इसका तात्पर्य है।