बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1166, कुल 1402 में से
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| ११५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तथापि हेत्वपहारात् कर्मानुपपत्तेर्विधिनिरोध एव स्यादिति चेत् । | पूर्व०-इस प्रकार भी तो हेतुकी निवृत्तिसे कर्मोंका होना असम्भव होनेके कारण विधिका ही निरोध हुआ। |
| न, कामप्रतिषेधात् काम्यप्रवृत्तिनिरोधवददोषात् । यथा स्वर्गकामो यजेतेति स्वर्गसाधने यागे प्रवृत्तस्य कामप्रतिषेधविधेः कामे विहते काम्ययागानुष्ठानप्रवृत्तिर्निरुध्यते न चैतावता काम्यविधिर्निरुद्धो भवति । | सिद्धान्ती-नहीं, कामनाके प्रतिषेधसे सकाम प्रवृत्तिके बाधके समान इसमें कोई दोष नहीं है। जिस प्रकार 'स्वर्गकी कामनावाला यजन करे'-इस वचनसे जो पुरुष स्वर्गके साधनभूत यज्ञमें प्रवृत्त है, उसकी कामनाका कामप्रतिषेध-विधिके अनुसार बाध हो जानेपर उसकी सकाम यज्ञके अनुष्ठानकी प्रवृत्ति रुक जाती है; किंतु इतनेहीसे सकाम कर्मोंकी विधिका बाध नहीं हो जाता १। |
| कामप्रतिषेधविधिना काम्यविधेरनर्थकत्वज्ञानात् प्रवृत्त्यनुपपत्तेर्निरुद्ध एव स्यादिति चेत् । | पूर्व०-कामप्रतिषेधविधिसे सकाम कर्मविधिकी व्यर्थताका बोध हो जानेसे काम्यकर्मोंमें प्रवृत्ति न हो सकनेके कारण उसका निरोध हो ही जायगा—ऐसा कहें तो ? |
| भवत्वेवं कर्मविधिनिरोधोऽपि । | सिद्धान्ती-इस प्रकार भले ही कर्मविधिका भी निरोध हो जाय । |
| यथा कामप्रतिषेधे काम्यविधेरेवं प्रामाण्यानुपपत्तिरिति | पूर्व०-जिस प्रकार कामनाका प्रतिषेध होनेपर काम्यविधिका प्रतिषेध हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञानसे कर्मविधिका बाध हो जानेपर उसका प्रामाण्य नहीं हो सकता । कर्म |
१. क्योंकि जिनकी कामना निवृत्त नहीं हुई है, उनके लिये तो वह विधि सार्थक रहती ही है ।