भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1170, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1170
११५६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| पितामहास्ते क्व गताः पिता च ॥" | कर देख, तेरे पिता-पितामह आदि कहाँ चले गये ?" | | एवं सांख्ययोगशास्त्रेषु च संन्यासो ज्ञानं प्रति प्रत्यासन्न उच्यते। कामप्रवृत्त्यभावाच्च। कामप्रवृत्तेर्हि ज्ञानप्रतिकूलता सर्वशास्त्रेषु प्रसिद्धा, तस्माद् विरक्तस्य मुमुक्षोर्विनापि ज्ञानेन ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेदित्याद्युपपन्नम्। | इसी प्रकार सांख्य और योग-शास्त्रोंमें भी संन्यास ज्ञानका समीपवर्ती कहा जाता है। कामनाकी प्रवृत्तिका अभाव होनेके कारण भी वह ज्ञानका अन्तरङ्ग साधन है। सकामप्रवृत्ति ज्ञानके प्रतिकूल है, यह तो सभी शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है; अतः विरक्त मुमुक्षुके लिये ज्ञान न होनेपर भी 'ब्रह्मचर्य-से ही संन्यास ले ले' इत्यादि विधि उचित ही है। | | ननु सावकाशत्वादनधिकृतविषयमेतदित्युक्तम्, यावज्जीवश्रुत्युपरोधात्। | पूर्व०—किंतु हम यह पहले कह चुके हैं कि [ सामग्रीके अभावमें ] 'जीवनभर अग्निहोत्र करे' इस विधिका निरोध हो जानेसे 'ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्' इस श्रुतिको अवकाश मिल जाता है, इसलिये यही मानना उचित है कि संन्यास कर्मके अनधिकारीके लिये ही है। | | नैष दोषः, नितरां सावकाशत्वाद् 'यावज्जीव'श्रुतीनाम् | सिद्धान्ती—यहाँ यह दोष नहीं आ सकता; क्योंकि जीवनभर अग्निहोत्र विधान करनेवाली श्रुतियोंको सदा ही अवकाश है [उनका कभी निरोध नहीं होता]; | | अविद्वत्कामिकर्तव्यतां ह्यवोचाम सर्वकर्मणाम्। न तु निरपेक्षमेव | क्योंकि सम्पूर्ण कर्मोंकी कर्तव्यता अज्ञानी और सकाम पुरुषोंके लिये है, यह हम बता आये हैं। बिना किसी इच्छाके |