बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें११२ वृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
जिघ्रति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥
फिर उन्होंने प्राणसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो।" तब प्राणने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया। प्राणमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और जो कुछ वह शुभ सूँघता है उसे अपने लिये गाया। असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उन्होंने उनके समीप जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अननुरूप सूँघता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है ॥ ३ ॥
अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति। तथेति तेभ्यश्चक्षुरुद्गायद्यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत् कल्याणं पश्यति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥४॥
फिर उन्होंने चक्षुसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो" तब चक्षुने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया। चक्षुमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और जो कुछ वह शुभ दर्शन करता है उसे अपने लिये गाया। असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अननुरूप देखता है यही वह पाप है, यही वह पाप है ॥ ४ ॥
अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति। तथेति तेभ्यः श्रोत्रमुद्गायद्यःश्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं