बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1189, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७५
| स्माच्छ्रुतिन्यायविरोधश्चाभिप्रेता- <br> र्थासिद्धिश्चैवंकल्पनायां स्यात्। <br><br> तस्माद् यथाव्याख्यात एवास्माभिः <br><br> 'पूर्णमदः' इत्यस्य मन्त्रस्यार्थः। | विज्ञानवान् है। अतः ऐसी कल्पना करनेमें श्रुति और युक्तिसे विरोध तथा अभिमत अर्थकी असिद्धि भी होगी। इसलिये 'पूर्णमदः' इत्यादि इस मन्त्रका अर्थ, जैसी हमने व्याख्या की है, वही है। |
ॐ खं ब्रह्म और उसकी उपासनाका वर्णन
ॐ खं ब्रह्म ! * खं पुराणं वायुरं खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदोऽयं ब्राह्मणा विदुर्वेदैनेन यद् वेदितव्यम् ॥ १ ॥
आकाश ब्रह्म ॐकार है। आकाश [ यहाँ जड नहीं ] सनातन [ परमात्मा ] है। 'जिसमें वायु रहता, वह आकाश ही ख है'—ऐसा कौरव्यायणीपुत्रने कहा है। यह ओङ्कार वेद है—ऐसा ब्राह्मण जानते हैं; क्योंकि जो ज्ञातव्य है, उसका इससे ज्ञान होता है ॥ १ ॥
| ॐ खं ब्रह्मेति मन्त्रोऽयं चान्यत्राविनियुक्त इह ब्राह्मणेन ध्यानकर्मणि विनियुज्यते। अत्र च ब्रह्मेति विशेष्याभिधानं खमिति विशेषणम्। विशेषण-विशेष्ययोश्च सामानाधिकरण्येन निर्देशो नीलोत्पलवत् खं ब्रह्मेति। | 'ॐ खं ब्रह्म' यह मन्त्र है। इसका कहीं अन्यत्र विनियोग नहीं हुआ, यहाँ ब्राह्मण इसका ध्यान-कर्ममें विनियोग करता है। इसमें भी 'ब्रह्म' यह विशेष्य-नाम है और 'खम्' यह विशेषण है। इस प्रकार 'नील कमल' के समान 'खं ब्रह्म' इस विशेष्य और विशेषणका यहाँ १समानाधिकरणरूपसे निर्देश किया गया |
* 'ॐ खं ब्रह्म' यह मन्त्र है। इससे आगे इसका व्याख्यानभूत ब्राह्मण है।
१. जिन पदोंकी विभक्ति, वचन और लिङ्ग एक-से हों, वे 'समानाधिकरण' होते हैं। यहाँ 'ख' और 'ब्रह्म'—दोनों ही शब्दोंमें प्रथमा विभक्ति, एकवचन और नपुंसक लिङ्ग है।