भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1196, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1196

११८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

| तेभ्य एवमर्थिभ्यो हैतदक्षरं वर्णमात्रमुवाच द इति—उक्त्वा च तान् पप्रच्छ पिता किं व्यज्ञासिष्टा ३ इति मयोपदेशार्थमभिहितस्याक्षरस्यार्थं विज्ञातवन्त आहोस्विन्न ? इति ।<br><br>देवा ऊचुः—व्यज्ञासिष्मेति विज्ञातवन्तो वयम् । यद्येवमुच्यतां किं मयोक्तम् ? इति, देवा ऊचुः—दाम्यत—अदान्ता यूयं स्वभावतः, अतो दान्ता भवत—इति नोऽस्मानात्थ कथयसि । इतर आह—ओमिति, सम्यग् व्यज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥ | इस प्रकार प्रार्थना करनेवाले उन देवताओंसे प्रजापतिने 'द' यह अक्षर—केवल वर्णमात्र कहा। और उनसे कहकर पिता प्रजापतिने पूछा, 'समझ गये क्या ? अर्थात् मैंने उपदेशके लिये जो अक्षर उच्चारण किया, उसका अर्थ तुम समझ गये या नहीं ?'<br><br>देवताओंने कहा, 'समझ गये, हम आपका अभिप्राय जान गये।' [ प्रजापति बोले— ] 'यदि ऐसी बात है, तो बताओ, मैंने क्या कहा है ?' देवताओंने कहा, 'आप हमसे कहते हैं, दमन–इन्द्रियनिग्रह करो, तुमलोग स्वभावसे अदान्त (अजितेन्द्रिय) हो, इसलिये दमनशील बनो।' इतर (प्रजापति) ने कहा, 'हाँ, ठीक समझे हो' ॥ १ ॥ |


अथ हैनँ मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भगवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दत्तेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ २ ॥

फिर प्रजापतिसे मनुष्योंने कहा, 'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और पूछा, 'समझ गये क्या ?' मनुष्योंने कहा, 'समझ गये, आपने हमसे 'दान करो' ऐसा कहा है।' तब प्रजापतिने 'हां समझ गये' ऐसा कहा ॥ २ ॥