बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1199, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1199
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११८४ |
|---|
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथापि देवादीनुद्दिश्य किमर्थं दकारत्रयमुच्चारितवान् प्रजापतिः पृथगनुशासनार्थिभ्यः । ते वा कथं विवेकेन प्रतिपन्नाः प्रजापतेर्मनोगतं समानेनैव दकारवर्णमात्रेणेति पराभिप्रायज्ञा विकल्पयन्ति । | तो भी अलग-अलग उपदेश-ग्रहणके इच्छुक देवादिके उद्देश्यसे प्रजापतिने तीन दकारोंका उच्चारण क्यों किया और उन्होंने भी एक अक्षर दकारमात्रसे ही प्रजापतिके मनोगत भावको पृथक्-पृथक् कैसे समझ लिया--इस प्रकार दूसरोंके अभिप्रायको समझनेवाले वादीलोग विकल्प करते हैं । |
| अत्रैक आहुरदान्तत्वादानत्त्वादयालृत्वैरपराधित्वमात्मनो मन्यमानाः शङ्किता एव प्रजापतावूषुः किं नो वक्ष्यतीति ? तेषां च दकारश्रवणमात्रादेवात्माशङ्कावशेन तदर्थप्रतिपत्तिरभूत् । लोकेऽपि हि प्रसिद्धम्—पुत्राः शिष्याश्चानुशास्याः सन्तो दोषान्निवर्तयितव्या इति । अतो युक्तं प्रजापतेर्दकारमात्रोच्चारणम्, दमादित्रये च दकारान्वयादात्मनो दोषानुरूप्येण देवादीनां विवेकेन प्रति- | यहां एक वादीका कथन है—अदान्तता (अजितेन्द्रियता), अदानता (कंजूसी या लोभ) और अदयालुत (निर्दयता) के कारण अपनेको अपराधी मानकर शङ्कित रहते हुए ही उन्होंने यह सोचकर कि, 'देखें ये हमें क्या उपदेश देते हैं' प्रजापतिके यहां ब्रह्मचर्यपूर्वक वास किया था । अतः अपनी आशङ्काके कारण उन्हें दकारके श्रवणमात्रसे ही उस अर्थकी प्रतीति हो गयी । लोकमें भी यह प्रसिद्ध ही है कि पुत्र और शिष्य, जिनका कि अनुशासन करना हो, उन्हें पहले दोषसे ही निवृत्त करना चाहिये । अतः प्रजापतिका दकारमात्र उच्चारण करना उचित ही है । तथा दमादि तीनोंमें दकारका अन्वय होनेसे अपने दोषके अनुसार देवादिका उन्हें अलग-अलग समझ लेना |
बृ० उ० ७५—