भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1202, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1202

तृतीय ब्राह्मण

हृदय-ब्रह्मकी उपासना

दमादिसाधनत्रयं सर्वोपासनशेषं विहितम्। दान्तोऽलुब्धो दयालुः सन् सर्वोपासनेष्वधिक्रियते। तत्र निरुपाधिकस्य ब्रह्मणो दर्शनमतिक्रान्तम्, अथाधुना सोपाधिकस्य तस्यैवाभ्युदयफलानि वक्तव्यानि, इत्येवमर्थोऽयमारम्भः—समस्त उपासनाओंके अङ्गभूत दमादि तीन साधनोंका विधान किया गया। दमनशील, निर्लोभ और दयालु होनेपर ही पुरुषका सारी उपासनाओंमें अधिकार होता है। वहाँ निरुपाधिक ब्रह्म-ज्ञानका निरूपण तो समाप्त हो चुका, अब सोपाधिक ब्रह्मकी अभ्युदयरूप फलवाली उपासनाएँ बतलानी हैं, इसीके लिये आरम्भ किया जाता है—

एष प्रजापतिर्यद्धृदयमेतद् ब्रह्मैतत् सर्वं तदेतत् त्र्यक्षरꣳ हृदयमिति ह इत्येकमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद ॥ १ ॥

जो हृदय है, वह प्रजापति है। यह ब्रह्म है, यह सर्व है, यह हृदय तीन अक्षरवाला नाम है। 'हृ' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, उसके प्रति स्वजन और अन्यजन बलि समर्पण करते हैं। 'द' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, उसे स्वजन और अन्यजन देते हैं। 'यम्' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, वह स्वर्गलोकको जाता है ॥१॥

एष प्रजापतिर्यद्धृदयं प्रजापतिरनुशास्तीत्यनन्तरमेवाभिहितम्। कः पुनरसावनुशास्ता प्रजापतिः ? इत्युच्यते—एष प्रजापतिःजो हृदय है वह प्रजापति है। प्रजापति अनुशासन करता है—यह अभी कहा जा चुका है। किंतु यह अनुशासनकर्ता प्रजापति कौन है ? सो बतलाया जाता है--यह प्रजापति
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