बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1224, कुल 1402 में से
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| १२१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| यदा वै पुरुषो विद्वानस्माल्लोकात् प्रैति शरीरं परित्यजति स तदा वायुमागच्छत्यन्तरिक्षे तिर्यग्भूतो वायुः स्तिमितोऽभेद्यस्तिष्ठति, स वायुस्तत्र स्वात्मनि तस्मै संप्राप्ताय विजिहीते स्वात्मावयवान् विगमयतिच्छिद्रीकरोत्यात्मानमित्यर्थः । किं-परिमाणं छिद्रम् ? इत्युच्यते— यथा रथचक्रस्य खं छिद्रं प्रसिद्धपरिमाणम् । | जिस समय पुरुष अर्थात् उपासक इस लोकसे मरकर जाता है, शरीर-त्याग करता है, उस समय वह वायुको प्राप्त होता है, आकाशमें तिर्यग्भूत (तिरछा होकर स्थित) वायु घनीभूत अर्थात् अभेद्यरूपसे विद्यमान है; वह वायु वहाँ अपनेमें प्राप्त हुए उस उपासकके लिये 'विजिहीते' अपने अवयवोंका विच्छेद कर देता है अर्थात् अपनेको छिद्रयुक्त कर देता है। कितना बड़ा छिद्र करता है, सो बतलाया जाता है--जैसा कि रथके पहियेका छिद्र होता है, वैसे प्रसिद्ध परिमाण-वाला छिद्र कर देता है। |
| तेनच्छिद्रेण स विद्वानूर्ध्व आक्रमत ऊर्ध्वः सन् गच्छति स आदित्यमागच्छति । आदित्यो ब्रह्मलोकं जिगमिषोर्मार्गनिरोधं कृत्वा स्थितः सोऽप्येवंविद उपासकाय द्वारं प्रयच्छति । तस्मै स तत्र विजिहीते, यथा लम्बरस्य खं वादित्रविशेषस्य-च्छिद्रपरिमाणं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमागच्छति । | उस छिद्रद्वारा वह विद्वान् ऊर्ध्व होकर चढ़ता है, अर्थात् ऊर्ध्वोन्मुख होकर जाता है, वह आदित्यलोकमें पहुँच जाता है। आदित्य ब्रह्मलोकको जानेवालेका मार्ग रोककर स्थित है। वह भी इस प्रकार जाननेवाले उस उपासकको मार्ग दे देता है। उसके लिये वहाँ वह अपने [ मण्डल ] को छिद्रयुक्त कर देता है; जैसा कि लम्बर नामक एक वाद्यविशेषके छिद्रका परिमाण होता है। उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढ़ता है, वह चन्द्रलोकमें पहुँच जाता है। |