बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1229, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण १२ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२१५ |
|---|
| किमर्थं पुनरन्नं ब्रह्मेति न ग्राह्यम्; यस्मात् पूयति क्लियते पूतिभावमापद्यत ऋते प्राणात्, तत् कथं ब्रह्म भवितुमर्हति ? ब्रह्म हि नाम तद् यदविनाशि। | किंतु 'अन्न ब्रह्म है' ऐसा क्यों नहीं समझना चाहिये ? क्योंकि प्राणके बिना यह सड़ता है, इसमें पानी छूटने लगता है अर्थात् यह पूतिभाव—दुर्गन्धको प्राप्त हो जाता है। फिर यह किस प्रकार ब्रह्म हो सकता है ? ब्रह्म तो वही हो सकता है, जो अविनाशी हो। | | अस्तु तर्हि प्राणो ब्रह्म, नैवम्; यस्माच्छुष्यति वै प्राणः शोषमुपैति ऋतेऽन्नात्, अत्ता हि प्राणः; अतोऽन्नेनाद्येन विना न शक्नोत्यात्मानं धारयितुम्; तस्माच्छुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नात् । अत एकैकस्य ब्रह्मता नोपपद्यते यस्मात् तस्मादेते ह त्वेवान्नप्राणदेवते एकधाभूयमेकधाभावं भूत्वा गत्वा परमतां परमत्वं गच्छतो ब्रह्मत्वं प्राप्नुतः। | अच्छा तो प्राण ही ब्रह्म रहे, ऐसा नहीं; क्योंकि अन्नके बिना प्राण सूख जाता है—शुष्कताको प्राप्त हो जाता है। प्राण तो अन्न भक्षण करनेवाला है; अतः अपने भक्ष्य अन्नके बिना वह अपनेको धारण करनेमें समर्थ नहीं है, इसीसे अन्नके बिना प्राण सूख जाता है। अतः इनमेंसे एक-एकका ब्रह्मत्व सम्भव नहीं है, इसलिये ये अन्न और प्राण--दो देवता एकरूप होकर—एकभावको प्राप्त होकर परमता----परमभावको प्राप्त होते अर्थात् ब्रह्मत्वको प्राप्त हो जाते हैं। | | तदेतदेवमध्यवस्य ह स्माह स्म प्रातृदो नाम पितरमात्मनः किंस्वित् स्विदिति वितर्के, यथा मया ब्रह्म परिकॢप्तमेवंविदुषे | इसे इस प्रकार निश्चय कर प्रातृद नामके ऋषिने अपने पितासे कहा—'किंस्वित्' (कौन सा)—इसमें 'स्वित्' यह वितर्कभाव सूचित करनेके लिये है, मैंने जिस प्रकार ब्रह्मकी कल्पना की है, उस प्रकार जाननेवालेका मैं |