बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1277, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२६३
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
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| सा ह वाक् प्रथमं बलिदानाय प्रवृत्ता ह किलोवाचोक्तवती यद् वा अहं वसिष्ठास्मि यन्मम वसिष्ठत्वं तत्तवैव तेन वसिष्ठगुणेन त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति । यद् वा अहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसि या मम प्रतिष्ठा सा त्वमसीति चक्षुः । समानमन्यत्; संपदायतनप्रजातित्वगुणान् क्रमेण समर्पितवन्तः । | प्रथम बलि देनेके लिये प्रवृत्त हुई उस वागिन्द्रियने कहा, 'मैं जो वसिष्ठा हूँ-मेरा जो वसिष्ठत्व है, वह तुम्हारा ही है अर्थात् उस वसिष्ठत्वरूप गुणसे तुम्हीं वह वसिष्ठ हो।' 'और मैं जो प्रतिष्ठा हूँ; वह प्रतिष्ठा तुम्हीं हो, अर्थात् मेरी जो प्रतिष्ठा है वह तुम हो' ऐसा चक्षुने कहा। शेष अर्थ इसीके समान है। उन्होंने अपने सम्पद, आयतन और प्रजातित्व गुणोंको क्रमशः प्राणको समर्पित किया। |
| यद्येवं साधु बलिं दत्तवन्तो भवन्तो ब्रूत तस्य उ म एवं-गुणविशिष्टस्य किमन्नं किं वास इति ? आहुरितरे—यदिदं लोके किञ्च किञ्चिदन्नं नामापि—आ श्वभ्य आ कृमिभ्य आ कीटपतङ्गेभ्यः, यच्च श्वान्नं कृम्यन्नं कीटपतङ्गान्नं च तेन सह सर्वमेव यत् किञ्चित् प्राणिभिरद्यमानमन्नं तत् सर्वं तवान्नम्, सर्वं प्राणस्यान्नमिति दृष्टिरत्र विधीयते । | [ प्राण बोला—] 'यदि ऐसी बात है तो तुमलोगोंने अच्छी भेंट दी। अब यह बताओ कि उस ऐसे गुणवाले मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है?' अन्य प्राणोंने कहा, 'लोकमें कुत्ते, कृमि और कीट-पतङ्गादिसे लेकर जितना भी अन्न है, जो भी कुत्तेका अन्न, कृमिका अन्न और कीट-पतङ्गोंका अन्न है, उसके सहित प्राणियोंद्वारा भक्षण किया जानेवाला जितना अन्न है, वह सभी तुम्हारा अन्न है।' यहाँ 'यह सब प्राणका अन्न है' ऐसी दृष्टिका विधान किया जाता है। |