बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1285, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1285
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७१
| संस्कृत-मूल (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तत्र च कति कर्मविपाकप्रतिपत्तिमार्गा इति सर्वसंसारगत्युपसंहारार्थोऽयमारम्भः। एतावती हि संसारगतिः, एतावान् कर्मणो विपाकः स्वाभाविकस्य शास्त्रीयस्य च सविज्ञानस्येति। | तहां कर्मफलभोगके कितने मार्ग हैं? यह बताकर सम्पूर्ण संसारकी गतिका उपसंहार करनेके लिये इस ग्रन्थका आरम्भ हुआ है। बस, इतनी ही संसारकी गति है तथा इतना ही स्वाभाविक और विज्ञानयुक्त शास्त्रीय कर्मका परिणाम है। |
| यद्यपि द्वया ह प्राजापत्या इत्यत्र स्वाभाविकः पाप्मा सूचितः, न च तस्येदं कार्यमिति विपाकः प्रदर्शितः। शास्त्रीयस्यैव तु विपाकः प्रदर्शितस्त्र्यन्नात्मप्रतिपत्त्यन्तेन, ब्रह्मविद्यारम्भे तद्वैराग्यस्य विवक्षितत्वात्। तत्रापि केवलेन कर्मणा पितृलोको विद्यया विद्यासंयुक्तेन च कर्मणा देवलोक इत्युक्तम्। तत्र केन मार्गेण पितृलोकं प्रतिपद्यते केन वा देवलोकमिति नोक्तम्; तच्चेह खिलप्रकरणेऽशेषतो वक्तव्यमित्यत आरभ्यते। अन्ते च सर्वोपसंहारः शास्त्रस्येष्टः। | यद्यपि 'द्वया ह प्राजापत्याः' इत्यादि प्रसंगमें स्वाभाविक पाप बतला दिया गया है; किंतु वहाँ 'उसका यह कार्य है' इस प्रकार फल नहीं दिखाया गया। त्र्यन्नरूपत्वकी प्राप्तितकके मन्त्रद्वारा केवल शास्त्रीय कर्मका ही फल दिखाया गया है; क्योंकि ब्रह्मविद्याके आरम्भमें उससे वैराग्य बतलाना अभीष्ट है। वहाँ भी केवल कर्मसे पितृलोक और विद्या (उपासना) से तथा विद्यासहित कर्मसे देवलोक मिलता है-ऐसा कहा गया है। वहां यह नहीं बताया गया कि किस मार्गसे पितृलोकमें जाया जाता है और किससे देवलोकको? यह बात यहां इस खिल प्रकरणमें पूर्णतया बतानी है, इसीसे इसको आरम्भ किया जाता है। शास्त्रके अन्तमें तो सबका उपसंहार ही इष्ट है। |