बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1290, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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पितृणामहं देवानामुत मर्त्यानां ताभ्यामिदं विश्वमेजत् समेति यदन्तरा पितरं मातरं चेति नाहमत एकञ्चन वेदेति होवाच ॥ २ ॥
जिस प्रकार मरनेपर यह प्रजा विभिन्न मार्गोंसे जाती है—'सो क्या तू जानता है ?' श्वेतकेतु बोला, 'नहीं' [ राजा-- ] 'जिस प्रकार वह पुनः इस लोकमें आती है, सो क्या तुझे मालूम है ?' 'नहीं' ऐसा श्वेतकेतुने उत्तर दिया । [ राजा-- ] 'इस प्रकार पुनः पुनः बहुतोंके मरकर जानेपर भी जिस प्रकार वह लोक भरता नहीं है, सो क्या तू जानता है ?' 'नहीं' ऐसा उसने कहा । [ राजा-- ] 'क्या तू जानता है कि कितने बारकी आहुतिके हवन करनेपर आप ( जल ) पुरुष-शब्द-वाच्य हो उठकर बोलने लगता है ?' 'नहीं' ऐसा श्वेतकेतुने कहा । 'क्या तू देवयानमार्गका कर्मरूप साधन अथवा पितृयानका कर्मरूप साधन जानता है, जिसे करके लोग देवयानमार्गको प्राप्त होते हैं अथवा पितृयान-मार्गको ? हमने तो मन्त्रका यह वचन सुना है--'मैंने पितरोंका और देवोंका इस प्रकार दो मार्ग सुने हैं, ये दोनों मनुष्योंसे सम्बन्ध रखनेवाले मार्ग हैं । इन दोनों मार्गोंसे जानेवाला जगत् सम्यक् प्रकारसे जाता है तथा ये मार्ग ( द्युलोक और पृथिवीरूप ) पिता और माताके मध्यमें हैं ?' इसपर श्वेतकेतुने 'मैं इनमेंसे एकको भी नहीं जानता' ऐसा उत्तर दिया ॥ २ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| वेत्थ विजानासि किं यथा येन प्रकारेणेमाः प्रजाः प्रसिद्धाः प्रयत्यो म्रियमाणा विप्रतिपद्यन्ता ३ इति विप्रतिपद्यन्ते, विचारणार्था प्लुतिः। समानेन मार्गेण गच्छन्तीनां मार्गद्वैविध्यं यत्र भवति तत्र काश्चित् प्रजा अन्येन मार्गेण गच्छन्ति काश्चिदन्येनेति विप्रति- | 'जिस प्रकार यह प्रसिद्ध प्रजा प्रेत होनेपर-मरनेपर विप्रतिपन्न होती है — सो क्या तू जानता है ? यहां 'विप्रतिपद्यन्ता ३' इसमें प्लुत स्वर प्रश्नके लिये है । समान मार्ग-से जाती हुई प्रजाके जहाँसे दो प्रकारके रास्ते हो जाते हैं, वहाँ कुछ प्रजा तो अन्य मार्गसे जाती है और कुछ दूसरेसे — इस प्रकार उन प्रजाओंकी विभिन्न गति होती है । तात्पर्य यह है कि जिस |