बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1295, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1295
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७९
| संस्कृत | हिन्दी |
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| सृतिभ्यां पितॄन् देवांश्च गच्छन्ति ? इत्युच्यते—उतापि मर्त्यानां मनुष्याणां संबन्धिन्यौ मनुष्या एव हि सृतिभ्यां गच्छन्तीत्यर्थः। ताभ्यां सृतिभ्यामिदं विश्वं समस्तमेजद् गच्छत् समेति संगच्छते।<br><br>ते च द्वे सृती यदन्तरा ययो-रन्तरा यदन्तरा पितरं मातरं च मातापित्रोरन्तरा मध्य इत्यर्थः, कौ तौ मातापितरौ द्यावापृथिव्यावण्डकपाले; ‘इयं वै मातासौ पिता’ इति हि व्याख्यातं ब्राह्मणेन, अण्डकपालयोर्मध्ये संसारविषये एवैते सृती नात्यन्तिकामृतत्वगमनाय। इतर आह—नाहमतोऽस्मात् प्रश्नसमुदायादेकं च नैकंमपि प्रश्नं न वेद नाहं वेदेति होवाच श्वेतकेतुः ॥ २ ॥ | किंतु इन दोनों मार्गोंसे पितृगण और देवताओंके पास कौन जाते हैं? सो बतलाया जाता है—'ये दोनों मार्ग मर्त्योके यानी मनुष्योंके सम्बन्धी हैं, अर्थात् इन मार्गोंसे मनुष्य ही जाते हैं। उन मार्गोंसे जानेवाला यह सम्पूर्ण जगत् सम्यक् प्रकारसे जाता है।'<br><br>'वे दोनों मार्ग 'यदन्तरा'—जिनके मध्यवर्ती हैं, उन माता-पिताको [ क्या तू जानता है? ] अर्थात् ये माता-पिताके मध्यमें हैं, वे माता-पिता कौन हैं? द्युलोक और पृथिवी-रूप ब्रह्माण्डकपाल; 'यह (पृथिवी) ही माता है और वह (द्युलोक) पिता है'—इस प्रकार ब्राह्मणद्वारा व्याख्या की जा चुकी है, ब्रह्माण्डकपालोंके मध्यमें ये दोनों मार्ग संसारविषयक ही हैं, आत्यन्तिक अमृतत्वकी प्राप्तिके लिये नहीं हैं।' इसपर दूसरेने कहा, 'मैं इस प्रश्न-समुदायमेंसे एक भी प्रश्नको नहीं जानता—मुझे किसीका पता नहीं है,' ऐसा श्वेतकेतुने कहा ॥२॥ |
श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आकर उलाहना देना
अथैनं वसत्योपमन्त्रयाञ्चक्रेऽनादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव स आजगाम पितरं तꣳहोवाचेति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोच इति कथꣳ सुमेध इति