भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 130
१२४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| तथा मनसोपगम्य आसनं चिन्तनं लौकिकप्रत्ययाव्यवधानेन यावत्तद्देवतादिस्वरूपात्माभिमानाभिव्यक्तिरिति लौकिकात्माभिमानवत् । "देवो भूत्वा देवानप्येति" ( बृ० उ० ४ । १ । २ ) "किन्देवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसि" (बृ० उ० ३ । ९ । २०) इत्येवमादिश्रुतिभ्यः ॥ ९ ॥ | स्वरूप ज्ञात कराया जाय वैसे ही स्वरूपको मनके द्वारा उपलब्ध करके उसके उप ( समीप ) आसन करना-बैठना अर्थात् लौकिक प्रत्ययोंका व्यवधान न आने देकर जबतक लौकिक आत्माभिमानके समान उस देवतादिके स्वरूपमें आत्मत्वका अभिमान उत्पन्न न हो तबतक उसीका चिन्तन करना उपासना है; जैसा कि "देवता होकर देवताओंमें लीन होता है" "इस पूर्व दिशामें तू किस देवतावाला ( किस देवताकी उपासना करनेवाला ) है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ॥ ६ ॥ |


प्राणोपासकसे मृत्यु दूर रहता है—इसकी उपपत्ति

| सा वा एषा देवता दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवतीत्युक्तम् । कथं पुनरेवंविदो दूरं मृत्युर्भवति ? इत्युच्यते—एवंविन्त्वविरोधात् । इन्द्रियविषयसंसर्गात्सङ्गो हि पाप्मा प्राणात्माभिमानिनो हि विरुध्यते, वागादिविशेषात्माभिमानहेतुत्वात् स्वाभाविकाज्ञान- | 'वह यह देवता है, उससे मृत्यु दूर रहता है' ऐसा ऊपर कहा गया । किंतु इस प्रकार जाननेवालेसे मृत्यु दूर क्यों रहता है ? सो बतलाया जाता है—क्योंकि इस प्रकार जाननेसे मृत्युका विरोध है । इन्द्रियजनित विषयोंके संसर्गसे होनेवाली आसक्ति ही पाप ( मृत्यु ) है, उसका प्राणात्माभिमानीसे विरोध है; क्योंकि वह वागादि परिच्छिन्नात्माभिमानका हेतु है और स्वाभाविक अज्ञानसे |