बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1302, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
|---|
| मा भूद् भवान्; न चान्यत्रादेयमस्ति भवतः ।<br><br>एवमुक्त आह—स त्वं वै हे गौतम तीर्थेन न्यायेन शास्त्रविहितेन विद्यां मत्त इच्छासा इच्छान्वाप्तुमित्युक्तो गौतम आह—उपैम्युपगच्छामि शिष्यत्वेनाहं भवन्तमिति । वाचा ह स्मैव किल पूर्वे ब्राह्मणाः क्षत्रियान् विद्यार्थिनः सन्तो वैश्यान् वा क्षत्रिया वा वैश्यानापद्युपयन्ति शिष्यवृत्त्या ह्युपगच्छन्ति नोपायनशुश्रूषादिभिः । अतः स गौतमो होपायनकीर्त्योपगमनकीर्तनमात्रेणैवोवासोषितवान्नोपायनं चकार ॥ ७ ॥ | लिये ही अदाता न हों। दूसरोंके लिये तो आपको कुछ भी अदेय नहीं है।<br><br>इस प्रकार कहे जानेपर राजाने कहा, 'अच्छा तो हे गौतम ! तुम 'तीर्थेन'--शास्त्रविहित विधिसे मुझसे विद्याग्रहण करनेकी इच्छा करो।' ऐसा कहे जानेपर गौतमने कहा, 'उपैमि'—मैं शिष्यभावसे आपके प्रति उपसन्न होता हूँ। विद्या प्राप्त करनेकी इच्छावाले पूर्ववर्ती ब्राह्मणलोग क्षत्रिय या वैश्योंके प्रति अथवा क्षत्रियलोग वैश्योंके प्रति आपत्तिकालमें केवल वाणीद्वारा ही शिष्यवृत्तिसे उपसन्न होते थे, किसी प्रकारकी भेंट देकर अथवा शुश्रूषादिके द्वारा उनका शिष्यत्व स्वीकार नहीं करते थे।¹ अतः उस गौतमने 'उपायनकीर्त्या'--उपसत्तिके कथनमात्रसे ही वहाँ निवास किया, वस्तुतः सेवा आदिके द्वारा उपगमन नहीं किया ॥ ७ ॥ |
प्रवाहणकी क्षमाप्रार्थना और विद्यादानके लिये तत्पर होना
| एवं गौतमेनापदन्तर उक्ते— | गौतमके इस प्रकार आपदन्तर कहनेपर— |
|---|
१. स्वयं विद्यानभिज्ञ होनेके कारण किसी हीन वर्णके पुरुषके पास शिष्यभावसे जाना—यह आपदन्तर (आपत्तिकाल) कहलाता है।