बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1308, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1308
१२९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कर्म । एवमग्निहोत्राहुत्यपूर्वविपरिणामात्मकं जगत् सर्वमित्याहुत्योरेव स्तुत्यर्थत्वेनोत्क्रान्त्याद्या लोकं प्रत्युत्थायितान्ताः षट् पदार्थाः कर्मप्रकरणेऽधस्तान्निर्णीताः । | जगतका आरम्भक है । इस प्रकार यह सारा जगत् अग्निहोत्रसे उत्पन्न हुए अपूर्वका विपरिणामरूप है, अतः आगे कर्मप्रकरणमें आहुतियोंकी ही स्तुतिके लिये उत्क्रान्तिसे लेकर यजमानके पुनः परलोकगमनके लिये उत्थान करनेतक छः पदार्थोंका निर्णय किया गया है । |
| इह तु कर्तुः कर्मविपाकविवक्षायां द्युलोकाग्न्याद्यारभ्य पञ्चाग्निदर्शनमुत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनं विशिष्टकर्मफलोपभोगाय विधित्सितमिति द्युलोकाग्न्यादिदर्शनं प्रस्तूयते । तत्र य आध्यात्मिकाः प्राणा इहाग्निहोत्रस्य होतारस्त एवाधिदैविकत्वेन परिणताः सन्त इन्द्रादयो भवन्ति । त एव तत्र होतारो द्युलोकाग्नौ । ते चेहाग्निहोत्रस्य फलभोगायाग्निहोत्रं हुतवन्तः । त एव फलपरिणामकालेऽपि तत्फलभोक्तृत्वात् तत्र तत्र होतृत्वं प्रतिपद्यन्ते तथा तथा विपरिणममाना देवशब्दवाच्याः सन्तः । | यहाँ (इस ब्राह्मणमें) तो कर्ताके कर्मफलके निरूपणकी इच्छा होनेपर द्युलोकाग्नि इत्यादिसे आरम्भ करके, विशिष्टफलके उपभोगके लिये उत्तरमार्गकी प्राप्तिकी साधनभूता पञ्चाग्निविद्याका विधान करना अभीष्ट है, इसलिये द्युलोकाग्नि आदि दृष्टि प्रस्तुत की जाती है ।<br><br>अतः यहाँ व्यवहारमें जो आध्यात्मिक प्राण अग्निहोत्रके होता हैं, वे ही आधिदैविकरूपमें परिणत होनेपर इन्द्रादि हो जाते हैं । वे ही वहाँ द्युलोकाग्निमें हवन करनेवाले हैं । उन्होंने यहाँ (इस लोकमें) अग्निहोत्रका फल भोगनेके लिये अग्निहोत्र किया था । फलके परिणामकालमें भी वे ही उस फलके भोक्ता होनेके कारण उस-उस स्थानमें वैसे-वैसे ही रूपसे परिणत होकर देवशब्दवाच्य हुए होतृत्वको प्राप्त होते हैं । |