बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1325, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण २] \hfill शाङ्करभाष्यार्थे \hfill १३०९
| तेभ्यो मासेभ्यः षण्मासदेवता-<br>भिरतिवाहिता देवलोकाभिमा-<br>निनीं देवतां प्रतिपद्यन्ते ।<br>देवलोकादादित्यमादित्याद् वैद्युतं<br>विद्युदभिमानिनीं देवतां प्रति-<br>पद्यन्ते । विद्युद्देवतां प्राप्तान् ब्रह्म-<br>लोकवासी पुरुषो ब्रह्मणा मनसा<br>सृष्टो मानसः कश्चिदेत्यागत्य<br>ब्रह्मलोकान् गमयति । | उन मासोंसे अर्थात् छः मास-<br>देवताओंसे ऊपर ले जाये जानेपर<br>वे देवलोकाभिमानी देवताको प्राप्त<br>होते हैं। देवलोकसे आदित्यको<br>और आदित्यसे वैद्युत-विद्युदभिमानी<br>देवताको प्राप्त होते हैं। विद्युद्देव-<br>ताको प्राप्त हुए इन उपासकोंको<br>ब्रह्माके द्वारा मनसे रचा हुआ कोई<br>ब्रह्मलोकवासी मानस पुरुष आकर<br>ब्रह्मलोकोंको ले जाता है। |
|---|---|
| ब्रह्मलोकानित्यधरोत्तरभूमि-<br>भेदेन भिन्ना इति गम्यन्ते, बहु-<br>वचनप्रयोगात्; उपासनतार-<br>तम्योपपत्तेश्च; ते तेन पुरुषेण<br>गमिताः सन्तःस्तेषु ब्रह्मलोकेषु<br>पराः प्रकृष्टाः सन्तः स्वयं परा-<br>वतः प्रकृष्टाः समाः संवत्सरान-<br>नेकान् वसन्ति । ब्रह्मणोऽनेकान्<br>कल्पान् वसन्तीत्यर्थः । तेषां<br>ब्रह्मलोकं गतानां नास्ति पुनरा-<br>वृत्तिरस्मिन् संसारे न पुनराग-<br>मनमिहेति शाखान्तरपाठात् । | ‘ब्रह्मलोकान्’ ऐसा बहुवचन<br>प्रयोग होनेसे ज्ञात होता है कि<br>नीचे-ऊपरकी भूमिके भेदसे ब्रह्म-<br>लोकोंमें भेद है। उपासनाके तार-<br>तम्यसे भी ऐसा भेद होना सम्भव<br>है। उस पुरुषके द्वारा पहुँचाये हुए<br>उन लोकोंमें वे स्वयं ‘पराः’—प्रकृष्ट<br>होकर ‘परावतः’ प्रकृष्ट संवत्सर<br>अर्थात् अनेक वर्षतक रहते हैं।<br>तात्पर्य यह है कि ब्रह्माके अनेकों<br>कल्पपर्यन्त रहते हैं। उन ब्रह्मलोक-<br>को गये हुए पुरुषोंकी पुनरावृत्ति<br>नहीं होती अर्थात् इस संसारमें<br>पुनरागमन नहीं होता, क्योंकि ‘इह<br>न पुनरावृत्तिः’ ऐसा दूसरी शाखा-<br>का पाठ है। |