बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1329, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३१३
| ते धूममभिसम्भवन्ति । उत्तरमार्ग इवेहापि देवता एव धूमादिशब्दवाच्याः, धूमदेवतां प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः। आतिवाहिकत्वं च देवतानां तद्वदेव । | वे धूमको प्राप्त होते हैं। उत्तरमार्गके समान यहाँ भी देवता ही धूमादिशब्दवाच्य हैं, तात्पर्य यह है कि वे धूमदेवताको प्राप्त होते हैं। इन देवताओंकी आतिवाहिकता भी उन्हीं ( उत्तरमार्गीय देवताओं ) के समान है। | | धूमाद् रात्रिं रात्रिदेवतां ततोऽपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षदेवतां ततो यान् षण्मासान् दक्षिणां दिशमादित्य एति तान् मासदेवताविशेषान् प्रतिपद्यन्ते। | धूमसे रात्रि अर्थात् रात्रिदेवताको, वहाँसे कृष्णपक्ष यानी कृष्णपक्षाभिमानी देवताको और वहाँसे जिन छः महीनोंमें सूर्य दक्षिणदिशामें होकर चलता है, उन मासदेवताविशेषोंको प्राप्त होते हैं। | | मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चन्द्रम् । ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्रान्नभूतान् यथा सोमं राजानमिह यज्ञे ऋत्विज आप्यायस्वापक्षीयस्वेति भक्षयन्त्येवमेनांश्चन्द्रं प्राप्तान् कर्मिणो भृत्यानिव स्वामिनो भक्षयन्त्युपभुञ्जते देवाः । | मासदेवताओंसे पितृलोकको और पितृलोकसे चन्द्रमाको जाते हैं। उस चन्द्रमामें पहुँचकर वे अन्न हो जाते हैं। 'तांस्तत्र अन्नभूतान्'—जिस प्रकार यहाँ यज्ञमें ऋत्विज् लोग 'आप्यायस्व अपक्षीयस्व' ऐसा कहकर सोम राजाको भक्षण करते हैं, इसी प्रकार चन्द्रमाको प्राप्त हुए इन अन्नभूत कर्मियोंको, स्वामी जिस प्रकार सेवकोंसे सेवा कराते हैं, उसी प्रकार देवतालोग भक्षण करते अर्थात् उनका उपभोग करते हैं। | | आप्यायस्वापक्षीयस्वेति न मन्त्रः किं तर्हि ? आप्याय्याप्याय्य | 'आप्यायस्व अपक्षीयस्व' यह कोई मन्त्र नहीं है; तो फिर क्या है ? तात्पर्य यह हे कि सोमको चमसमें |
बृ० उ० ८३—