बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1331, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1331
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| आकाशभूता इव भवन्ति । तदिदमुच्यत इममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त इति । | आकाशभूत-सा हो जाता है । इसीसे यह कहा जाता है कि वे इस प्रसिद्ध आकाशको ही अभिनिष्पन्न होते हैं । |
| ते पुनरपि कर्मिणस्तच्छरीराः सन्तः पुरोवातादिना इतश्चामुतश्च नीयन्तेऽन्तरिक्षगास्तदाह—आकाशाद् वायुमिति । वायोर्वृष्टिं प्रतिपद्यन्ते; तदुक्तम्—पर्जन्याग्नौ सोमं राजानं जुह्वतीति । ततो वृष्टिभूता इमां पृथिवीं पतन्ति । ते पृथिवीं प्राप्य व्रीहियवाद्यन्नं भवन्ति, तदुक्तमस्मिँल्लोकेऽग्नौ वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं सम्भवतीति । | वे आकाशशरीर हुए कर्मी फिर भी पूर्ववायु आदिसे अन्तरिक्षमें इधर-उधर ले जाये जाते हैं, इसीसे श्रुति कहती है—'आकाशसे वायुको प्राप्त होते हैं ।' 'वायुसे वृष्टिको प्राप्त होते हैं', इसीसे ऊपर कहा है--'देवगण पर्जन्याग्निमें सोम राजाको हवन करते हैं ।' वहाँसे वे वृष्टिरूप होकर पृथिवीपर गिरते हैं । पृथिवीपर पहुँचकर वे व्रीहि एवं यवादि अन्न हो जाते हैं, इसीसे कहा है--'देवतालोग इस लोकरूप अग्निमें वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे अन्न होता है ।' |
| ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्तेऽन्नभूता रेतस्सिचि; ततो रेतोभूता योषाग्नौ हूयन्ते; ततो जायन्ते लोकं प्रत्युत्थायिनस्ते लोकं प्रत्युत्तिष्ठन्तोऽग्निहोत्रादिकर्मानुतिष्ठन्ति । ततो धूमादिना पुनः पुनः सोमलोकं पुनरिमं लोक- | अन्न होनेपर वे वीर्याधान करनेवाले पुरुषरूप अग्निमें हवन किये जाते हैं; फिर वीर्यरूप हुए स्त्रीरूप अग्निमें होम किये जाते हैं; तदनन्तर वे परलोकगमनके लिये उद्यत होकर जन्म लेते हैं; वे परलोकके प्रति उद्यत होकर अग्निहोत्रादि कर्मका अनुष्ठान करते हैं । फिर धूमादिके क्रमसे पुनः-पुनः सोमलोकको और पुनः इस लोकको |