बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1334, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| पद्यन्ते केचिद् धूममिति विप्रतिपत्तिः । पुनरावृत्तिश्च द्वितीयः प्रश्न आकाशादिक्रमेणेमं लोकमागच्छन्तीति । तेनैवासौ लोको न सम्पूर्यते कीटपतङ्गादिप्रतिपत्तेश्च केषांचिदिति तृतीयोऽपि प्रश्नो निर्णीतः ॥ १६ ॥ | होते हैं और कोई धूमादिमार्गको—इस प्रकार उन्हें विभिन्न मार्गोंकी प्राप्ति होती है । पुनरावृत्ति दूसरा प्रश्न है; उसका 'आकाशादि क्रमसे इस लोकमें आते हैं'—इस प्रकार निर्णय किया गया है । इसीसे परलोक भरता नहीं है तथा कुछ कीट-पतंगादि योनियोंको प्राप्त हो जाते हैं—इसलिये भी वह नहीं भरता—इस प्रकार तीसरे प्रश्नका भी निर्णय हो गया है ॥ १६ ॥ |
<div align="center">इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये द्वितीयं कर्मविपाकब्राह्मणम् ॥ २ ॥
तृतीय ब्राह्मण
श्रीमन्थकर्म और उसकी विधि
</div>| स यः कामयेत-ज्ञानकर्मणोर्गतिरुक्ता। तत्र ज्ञानं स्वतन्त्रं कर्म तु दैवमानुषवित्तद्वयायत्तं तेन कर्मार्थं वित्तमुपार्जनीयम् । तच्चाप्रत्यवायकारिणोपायेनेति तदर्थं | 'स यः कामयेत'—ज्ञान और कर्मकी गति बतला दी गयी। इनमें ज्ञान स्वतन्त्र है, किंतु कर्म दैव और मानुष—इन दो वित्तोंके अधीन है, अतः कर्मके लिये वित्तोपार्जन करना चाहिये । वह भी, जो प्रत्यवाय न करनेवाला हो, उस मार्गसे उपार्जन करना चाहिये । अतः उसके लिये |