बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1342, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहे-<br>त्यारभ्य द्वे द्वे आहुती हुत्वा<br>मन्थे संस्रवमवनयति। स्रुगाव-<br>लेपनमाज्यं मन्थे संस्रावयति।<br>एतस्मादेव ज्येष्ठाय श्रेष्ठायेत्यादि-<br>प्राणलिङ्गाज्ज्येष्ठश्रेष्ठादिप्राणविद<br>एवास्मिन् कर्मण्यधिकारः। रेतस<br>इत्यारभ्यैकैकामाहुतिं हुत्वा मन्थे<br>संस्रवमवनयत्यपरयोपमन्थन्या-<br>पुनर्मथ्नाति ॥ २-३ ॥ | 'ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहा'<br>यहाँसे लेकर दो-दो आहुतियाँ हवन<br>करके संस्रवको मन्थमें डाल देता<br>है। अर्थात् स्रुवासे लगे हुए घृतको<br>मन्थमें गिरा देता है। इस 'ज्येष्ठाय<br>श्रेष्ठाय' इत्यादि प्राणके लिङ्गसे ही<br>यह निश्चय होता है कि इस कर्ममें<br>ज्येष्ठ-श्रेष्ठादिरूप प्राणोपासकका ही<br>अधिकार है। 'रेतसे स्वाहा' यहाँ-<br>से लेकर एक-एक आहुति हवन<br>करके मन्थमें संस्रव डालता है।<br>फिर दूसरी उपमथानीसे उसका<br>मन्थन करता है ॥ २-३ ॥ |
मन्थाभिमर्शका मन्त्र
अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकसभमसि हिङ्कृतमसि हिङ्क्रियमाणमस्युद्गीथमस्युद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्रे संदीप्तमसि विभूरसि प्रभूरस्यन्नमसि ज्योतिरासि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥
इसके पश्चात् उस मन्थको 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रद्वारा स्पर्श करता है। [मन्थद्रव्यका अधिष्ठातृदेव प्राण है, इसलिये प्राणसे एकरूप होनेके कारण वह सर्वात्मक है 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है—] तू [प्राणरूपसे सम्पूर्ण देहोंमें] भ्रमनेवाला है, [अग्निरूपसे सर्वत्र] प्रचलित होनेवाला है, [ब्रह्मरूपसे] पूर्ण है, [आकाशरूपसे] अत्यन्त