बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1354, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासाँ स्त्रीणाँ सुकृतं वृङ्क्तेऽथ य इदमविद्वानधोपहासं चरत्यास्य स्त्रियः सुकृतं वृञ्जते ॥ ३ ॥
स्त्रीकी उपस्थेन्द्रिय वेदी है, वहाँके रोएँ कुशा हैं, योनिका मध्यभाग प्रज्वलित अग्नि है, योनिके पार्श्वभागमें जो दो कठोर मांसखण्ड हैं उनको मुष्क कहते हैं, वे दोनों मुष्क ही 'अधिषवण' नामसे प्रसिद्ध चर्ममय सोम-फलक हैं। वाजपेय यज्ञ करनेसे यजमानको जितना पुण्यलोक प्राप्त होता है, उतना ही उसे भी प्राप्त होता है। जो कि इस प्रकार जानकर मैथुनका आचरण करता है, वह इन स्त्रियोंके पुण्यको अवरुद्ध कर लेता है और जो इसे नहीं जानता है, वह यदि मैथुन करता है तो स्त्रियाँ ही उसके पुण्यको अवरुद्ध कर लेती हैं ॥ ३ ॥
| तस्या वेदिरित्यादि सर्वं सामान्यं प्रसिद्धम् । समिद्धोऽग्निर्मध्यतः स्त्रीव्यञ्जनस्य तौ मुष्कावधिषवणफलके इति व्यव- | 'तस्या वेदिः' इत्यादि सभी समानताएँ प्रसिद्ध हैं। स्त्री-योनिका मध्यभाग प्रज्वलित अग्नि है। वे दोनों मुष्क (योनिके पार्श्वभागके युगल मांसखण्ड) 'अधिषवण' नामसे प्रसिद्ध सोमफलक हैं; इस प्रकार 'चर्माधिषवणे' पदका दूरस्थित |
उत्पत्तिमें यही विज्ञान साधन-स्वरूप रहा है। अतएव इसको जानकर ही प्रत्येक पुरुष इसके द्वारा विश्व-कल्याणमें सहायक हो सकता है। अवश्य ही यह विज्ञान उन्हीं लोगोंके लिये है, जो प्रजोत्पादनके योग्य गृहस्थ-आश्रममें तथा तरुण-अवस्थामें हैं। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, यति एवं बालक-वृद्धोंके लिये अथवा संसारसे सर्वथा विरक्त पुरुषोंके लिये यह विषय त्याज्य है। इस विज्ञानके प्रतिपादनमें उन वाक्यों या शब्दोंका आना अनिवार्य है, जो अश्लील समझे जाते हैं; क्योंकि उसी विषयको समझाना है; अतएव इस प्रसंगके पाठक इसी दृष्टिसे इसको पढ़ें और सोचें।