भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1361, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1361

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३४५

इति तदा यशस्विनावेवोभावपि भवतः ॥ ८ ॥समीप जाय। तब वे दोनों दम्पति यशस्वी (सन्तानवान्) ही होते हैं॥ ८॥

स यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखँ संधायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेदङ्गादङ्गात् संभवसि हृदयादधिजायसे। स त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्घविद्धामिव मादयेमाममूं मयीति ॥६॥

वह पुरुष अपनी जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा करे कि यह मुझे हृदयसे चाहे, उसकी योनिमें अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके और अपने मुखसे उसके मुखको मिलाकर उसके उपस्थभागका स्पर्श करते हुए इस मन्त्रका जप करे—'हे वीर्य ! तुम मेरे प्रत्येक अङ्गसे प्रकट होते हो, विशेषतः हृदयसे नाड़ीद्वारा तुम्हारा प्रादुर्भाव होता है, तुम मेरे अङ्गोंके रस हो। अतः जिस प्रकार विष लगाये हुए बाणसे घायल हुई हरिणी मूर्च्छित हो जाती है, उसी प्रकार तुम मेरी इस पत्नीको मेरे प्रति उन्मत्त बना दो—इसे मेरे अधीन कर दो' ॥ ६ ॥

स यां स्वभार्यामिच्छेदियं मां कामयेतेति तस्यामर्थं प्रजनननेन्द्रियं निष्ठाय निक्षिप्य मुखेन मुखं संधायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेदिमं मन्त्रमङ्गादङ्गादिति ॥९॥वह पुरुष अपनी जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा करे कि यह मेरे प्रति कामनायुक्त हो मुझे मन-से चाहने लगे, उसका योनिमें अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके उसके मुखसे अपना मुख मिलाकर उसके उपस्थका स्पर्श करते हुए इस मन्त्रका जप करे—'अङ्गादङ्गादित्यादि' ॥ ६ ॥

अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखँ संधायाभिप्राण्यापान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १० ॥

बृ० उ० ८५—

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