भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1377, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1377

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३६१


अथ दधि मधु घृतं संनीयानन्त-<br><br>र्हितेनाव्यवहितेन जातरूपेण<br><br>हिरण्येन प्राशयत्येतैर्मन्त्रैः<br><br>प्रत्येकम् ॥ २५ ॥तत्पश्चात् काँसके कटोरेमें दही, मधु और घी लेकर किसी दूसरे द्रव्यके व्यवधानसे रहित विशुद्ध सोनेकी चम्मचद्वारा 'भूस्ते' इत्यादि मन्त्र पढ़कर बालकको प्रत्येक वस्तु चटावे ॥ २५ ॥

नाम-कर्म

अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥

इसके बाद बालकका नामकरण करे। 'तुम वेद हो।' अतः वेद यह उस बालकका गुप्त नाम ही होता है ॥ २६ ॥

अथास्य नामधेयं करोति वेदोऽसीति । तदस्य तद् गुह्यं नाम भवति वेद इति ॥ २६ ॥इसके बाद इस बालकका नामकरण करे 'तुम वेद हो' अतः वेद उस बालकका गोपनीय नाम होता है ॥ २६ ॥

अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः । येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७ ॥

तदनन्तर इस बालकको माताकी गोदमें देकर 'यस्ते स्तनः' इत्यादि मन्त्र पढ़ते हुए स्तन पिलावे [मन्त्रका भाव इस प्रकार है-] 'हे सरस्वति ! तुम्हारा जो स्तन दूधका अक्षयभण्डार तथा पोषणका आधार है, जो रत्नोंकी खान है तथा सम्पूर्ण धन-राशिका ज्ञाता और उदार दानी है तथा जिसके द्वारा तुम समस्त वरणीय पदार्थोंका पोषण करती हो, इस सत्पुत्रके जीवनधारणार्थ उस स्तनको तुम मेरी पत्नीके शरीरमें प्रविष्ट होकर इस शिशुके मुखमें दे दो ॥ २७ ॥

बृ० उ० ८६—