बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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( १३७१ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| आप एवेदमग्र आसु० ... | ५ | ५ | १ | ११६४ |
| आपो वा अर्कस्तद्यदपाँ ... | १ | २ | २ | ६७ |
| आराममस्य पश्यन्ति | ४ | ३ | १४ | ६३८ |
| इदं मानुषँ सर्वेषां ... | २ | ५ | १३ | ५६३ |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । आथर्व० | २ | ५ | १७ | ६०७ |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । तद्वां | २ | ५ | १६ | ६०३ |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । पुरश्चक्रे | २ | ५ | १८ | ६१० |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । रूपँ ... | २ | ५ | १९ | ६१२ |
| इदं सत्यँ सर्वेषां ... | २ | ५ | १२ | ५६२ |
| इन्धो ह वै नामैष ... | ४ | २ | २ | ८६० |
| इमा आपः सर्वेषां ... | २ | ५ | २ | ५८४ |
| इमा दिशः सर्वेषां ... | २ | ५ | ६ | ५८७ |
| इमावेव गौतमभरद्वाजा० ... | २ | २ | ४ | ५१० |
| इयं पृथिवी सर्वेषां ... | २ | ५ | १ | ५८२ |
| इयं विद्युत्सर्वेषां भूतानां ... | २ | ५ | ८ | ५८८ |
| इहैव सन्तोऽथ विद्म० ... | ४ | ४ | १४ | १०८२ |
| उक्थं प्राणो वा उक्थं ... | ५ | १३ | १ | १२१८ |
| उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य ... | १ | १ | १ | ३६ |
| ऋचो यजूंषि ... | ५ | १४ | २ | १२२४ |
| एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्र० ... | ४ | ४ | २० | १०८८ |
| एकीभवति न पश्यती० ... | ४ | ४ | २ | १०२८ |
| एतद्व वै तज्जनको ... | ५ | १४ | ८ | १२३६ |
| एतद्ध स्म वै तद्विद्वानु० ... | ६ | ४ | ४ | १३३६ |
| एतद्वै परमं तपो ... | ५ | ११ | १ | १२११ |
| एतमु हैव चूलो ... | ६ | ३ | १० | १३३१ |
| एतमु हैव जानकिराय० ... | ६ | ३ | ११ | १३३१ |
| एतमु हैव मधुकः ... | ६ | ३ | ९ | १३३१ |
| एतमु हैव वाजसनेयो ... | ६ | ३ | ८ | १३३० |
| एतमु हैव सत्यकामो ... | ६ | ३ | १२ | १३३१ |
| एतस्य वा अक्षरस्य ... | ३ | ८ | ८ | ७६६ |
| एष उ एव बृहस्पति० ... | १ | ३ | २० | १४० |
| एष उ एव ब्रह्मणस्पति० ... | १ | ३ | २१ | १४२ |
| एष उ एव साम वाग्वै ... | १ | ३ | २२ | १४४ |
| एष उ वा उद्गीथः ... | १ | ३ | २३ | १४७ |