भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 151

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
उ० १ । ७ इति श्रुत्यन्तरगत् वाक्प्राणाभिधानभूतोऽयं सामशब्दः, तथा प्राणनिर्वर्त्यस्वरादिसमुदायमात्रं गीतिः सामशब्देनाभिधीयते; अतो न प्राणवाग्व्यतिरेकेण सामनामास्ति किञ्चित्, स्वरवर्णादेश्च प्राणनिर्वर्त्यत्वात्प्राणतन्त्रत्वाच्च । एष उ एव प्राणः साम । यस्मात्साम सामेति वाक्प्राणात्मकम्—सा चामश्चेति, तत्तस्मात्साम्नो गीतिरूपस्य स्वरादिसमुदायस्य सामत्वं तत्प्रगीतं भुवि ।‘वाणीसे’ ऐसा कहे” इस अन्य श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है। यह ‘साम’ शब्द वाक् और प्राणका अभिधानभूत है तथा प्राणसे निष्पन्न होनेवाला जो स्वरादिका समुदायमात्र गान है वह भी ‘साम’ शब्दसे कहा जाता है; अतः प्राणरूप वाणीके व्यापारके सिवा ‘साम’ नामकी कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि स्वर और वर्णादि भी प्राणसे निष्पन्न होनेवाले और प्राणके ही अधीन हैं। अतः यह प्राण ही साम है। क्योंकि ‘सा’ और ‘अम’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार ‘साम साम’ इस प्रकार कहा जानेवाला पदार्थ वाक् और प्राणरूप ही है, इसलिये गीतिरूप जो सामसंज्ञक स्वरादिसमुदाय है उसका लोकमें सामत्व विख्यात है।
यद् उ एव समस्तुल्यः सर्वेण वक्ष्यमाणेन प्रकारेण, तस्माद्वा सामेत्यनेन सम्बन्धः । वाशब्दः सामशब्दलाभनिमित्तप्रकारान्तरनिर्देशसामर्थ्यलभ्यः । केन पुनः प्रकारेण प्राणस्य तुल्यत्वम् ?अथवा क्योंकि आगे कहे जानेवाले प्रकारसे यह सबके समान यानी तुल्य है, इसलिये साम है—इस वाक्यके साथ यद्व एव···इत्यादि वाक्यका सम्बन्ध है। ‘वा’ शब्द सामशब्दलाभके निमित्तभूत प्रकारान्तरका निर्देश करनेकी सामर्थ्यसे प्राप्त होनेवाला है। तो फिर किस प्रकारसे प्राणकी तुल्यता है ? यह

बृ० उ० १०—