बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 153, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 153
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७
| तत्फलम्-अश्नुते व्याप्नोति साम्नः प्राणस्य सायुज्यं सयुग्भावं समानदेहेन्द्रियाभिमानत्वम्, सालोक्यं समानलोकतां वा भावनाविशेषतः, य एवमेतद्यथोक्तं साम प्राणं वेद--आ प्राणात्माभिमानाभिव्यक्तेरुपास्ते इत्यर्थः ॥२२॥ | जानता है उसे यह फल प्राप्त होता है--वह सामसंज्ञक प्राणका सायुज्य-सयुग्भाव अर्थात् उसके साथ एक ही देह और इन्द्रियादिका अभिमान प्राप्त करता है तथा भावनाविशेषसे सालोक्य यानी समानलोकता प्राप्त करता है, जो इस प्रकार इस उपर्युक्त सामरूप प्राणको जानता है अर्थात् प्राणात्मत्वका अभिमान उदय होनेपर्यन्त उसकी उपासना करता है ॥ २२ ॥ |
|---|
प्राणके उद्गीथत्वकी उपपत्ति
एष उ वा उद्गीथः प्राणो वा उत्प्राणेन हीदँ सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥
यह ही उद्गीथ है। प्राण ही उत् है, प्राणके द्वारा ही यह सब उत्तब्ध--धारण किया हुआ है। वाक् ही गीथा है। वह उत् है और गीथा भी है; इसलिये उद्गीथ है ॥ २३ ॥
| एष उ वा उद्गीथः । उद्गीथो नाम सामावयवो भक्तिविशेषो नोद्गानम्, सामाधिकारात् । कथमुद्गीथः प्राणः ? प्राणो वा उत्प्राणेन हि यस्मादिदं सर्वं जगदुत्तब्धमूर्ध्वं स्तब्धमुत्तम्भितं विधृतमित्यर्थः । उत्तब्धार्थाव- | यह ही 'उद्गीथ' है। 'उद्गीथ' शब्दसे सामकी अवयवभूत भक्ति-विशेष अभिप्रेत है, उद्गान नहीं; क्योंकि यहाँ सामका ही अधिकरण है। प्राण उद्गीथ किस प्रकार है ?- प्राण ही 'उत्' है; क्योंकि प्राणसे ही यह सब जगत् उत्तब्ध--ऊपरकी ओर ठहरा हुआ अर्थात् विधृत है। 'उत्तब्ध' अर्थका द्योतन करनेवाला |
|---|