भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 155

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४९


| ब्रह्मदत्तो नामतः चिकितानस्यापत्यं चैकितानस्तदपत्यं युवा चैकितानेयः, राजानं यज्ञे सोमं भक्षयन्नुवाच । किम् ? अयं चमसस्थो मया भक्ष्यमाणो राजा त्यस्य तस्य ममानृतवादिनो मूर्धानं शिरो विपातयताद्विस्पष्टं पातयतु । तोरयं तातङादेशः आशिषि लोट्, विपातयतादिति । यदहमनृतवादी स्यामित्यर्थः ।<br><br>कथं पुनरनृतवादित्वप्राप्तिः ? इत्युच्यते—यद्यदीतोऽस्मात्प्रकृतात् प्राणाद्वाक्संयुक्तात्, अयास्यः-मुख्यप्राणाभिधायकेन | वाला चैकितानेय—चिकितानके पुत्र चैकितानका युवसंज्ञक¹ अपत्य (संतान) यज्ञमें राजा अर्थात् सोमका भक्षण करता हुआ बोला। क्या बोला—"यह मेरेद्वारा भक्षण किया जाता हुआ चमसस्थ सोम 'त्यस्य'—उस मुझ मिथ्यावादीके मस्तकको विपतित—विस्पष्टतया पतित कर दे, अर्थात् यदि मैं मिथ्यावादी होऊँ तो ऐसा हो।" यहाँ [आशिषि लिङ्लोटौ इस सूत्रके नियमानुसार ] आशीर्वाद अर्थमें लोट् लकार है। 'विपातयतु' के 'तु' प्रत्ययको तातङ् आदेश होकर 'विपातयतात्' यह रूप सिद्ध हुआ है।²<br><br>किंतु मुझे मिथ्यावादित्वकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? सो बतलाया जाता है—"यदि इस प्रकृत वाक्संयुक्त प्राणसे अयास्यने, जो मुख्यप्राणके वाचक अयास्याङ्गिरस शब्दद्वारा |


१. व्याकरणशास्त्रीय प्रक्रियामें अपत्य तीन प्रकारके माने गये हैं, १ अनन्तरापत्य, २ गोत्रापत्य और ३ युवापत्य । पुत्रको अनन्तरापत्य कहते हैं, पौत्रसे लेकर जितनी भी होनेवाली पीढ़ियाँ हैं, सभी गोत्रापत्य कहलाती हैं, किंतु जिसके पिता आदिमेंसे कोई भी जीवित हो, वह संतान यदि मूल पुरुषसे नीचेकी चौथी आदि पीढ़ियोंमेंसे है अर्थात् पौत्रका पुत्र आदि है तो उसको युवापत्य कहते हैं।
२. संस्कृतमें आज्ञा अर्थमें 'लोट्' लकार होता है। उसका आशीर्वादके अर्थमें भी प्रयोग होता है। उसके प्रथमपुरुषका एक वचन प्रत्यय 'ति' है, उसीके इकारको उकार आदेश होनेसे 'तु' होता है और फिर उसका 'तातङ्' आदेश होकर 'तात्' रूप बनता है।