बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 157, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे [१५१
कर्म करनेवालेको वाणीमें स्वरकी इच्छा करनी चाहिये। उस स्वर-सम्पन्न वाणीसे ऋत्विक् कर्म करे। इसीसे यज्ञमें स्वरवान् उद्गाताको देखनेकी इच्छा करते ही हैं। लोकमें भी जिसके पास धन होता है [ उसे ही देखना चाहते हैं ]। जो इस प्रकार इस सामके धनको जानता है उसे धन प्राप्त होता है ॥ २५ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तस्येति प्रकृतं प्राणमभि- <br><br> सम्बध्नाति। हैतस्येति मुख्यं <br><br> व्यपदिशत्यभिनयेन। साम्नः <br><br> सामशब्दवाच्यस्य प्राणस्य यः स्वं <br><br> धनं वेद, तस्य ह किं स्यात् ? <br><br> भवति हास्य स्वम्। फलेन प्रलो- <br><br> भ्याभिमुखी कृत्य शुश्रूषवे आह— <br><br> तस्य वै साम्नः स्वर एव स्वम्। <br><br> स्वर इति कण्ठगतं माधुर्यं तदे- <br><br> वास्य स्वं विभूषणम्। तेन हि <br><br> भूषितमृद्धिमल्लक्ष्यत उद्गानम्। <br><br> यस्मादेवं तस्मादार्त्विज्यं <br><br> ऋत्विकर्मोद्गानं करिष्यन्वाचि <br><br> विषये वाचि वागाश्रितं स्वरमि- <br><br> च्छेन्न इच्छेत् साम्नो धनवत्तां <br><br> स्वरेण चिकीर्षुरुद्गाता। इदं तु | 'तस्य' इस सर्वनामसे श्रुति प्रकृत प्राणका सम्बन्ध दिखाती है। 'ह एतस्य' इन पदोंसे श्रुति मुख्यप्राणको अङ्गुलिनिर्देशद्वारा बतलाती है। साम अर्थात् साम-शब्दवाच्य मुख्यप्राणके स्व यानी धनको जो पुरुष जानता है उसे क्या फल मिलता है?—उसे धनकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार फलके द्वारा प्रलोभित कर उसे अपनी ओर अभिमुख करके श्रुति श्रवणके इच्छुकसे कहती है—निश्चय उस सामका स्वर ही धन है। स्वर कण्ठगत मधुरताको कहते हैं, वही इसका धन—विभूषण है। उसके द्वारा भूषित होनेपर ही उद्गान समृद्धिमान् दिखायी देता है। <br><br> क्योंकि ऐसा है, इसलिये आर्त्विज्य यानी उद्गानरूप ऋत्विक्कर्म करते हुए स्वरके द्वारा सामकी समृद्धि सम्पादन करनेकी इच्छावाले उद्गाताको वाणीके विषयमें अर्थात् वाणीके आश्रित स्वरकी इच्छा करनी |