बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 159, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 159
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५३
| पूर्वं कण्ठगतमाधुर्यमिदं तु लाक्षणिकं सुवर्णशब्दवाच्यम् । | है कि पहली सुस्वरता कण्ठगत माधुर्य थी और वह सुवर्णशब्दवाच्य माधुर्य लाक्षणिक है । |
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तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णं तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥
जो उस इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण प्राप्त होता है। उसका स्वर ही सुवर्ण है। जो इस प्रकार इस सामके सुवर्णको जानता है। उसे सुवर्ण मिलता है ॥ २६ ॥
| तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णम् । सुवर्णशब्दसामान्यात्स्वरसुवर्णयोः लौकिकमेव सुवर्णं गुणविज्ञानफलं भवतीत्यर्थः । तस्य वै स्वर एव सुवर्णम् । भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेदेति पूर्ववत्सर्वम् ॥ २६ ॥ | जो उस इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण प्राप्त होता है। स्वर और सुवर्ण इन दोनोंके लिये सुवर्ण शब्दका प्रयोग समान-रूपसे होता है, इसलिये उस गुणके विज्ञानका फल लौकिक सुवर्ण ही होता है। निश्चय स्वर ही उस (साम) का सुवर्ण है। जो इस प्रकार इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण मिलता है—इस प्रकार सब अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ २६ ॥ |
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सामके प्रतिष्ठागुणको जाननेवालेका फल
| तथा प्रतिष्ठागुणं विधित्सन्नाह— | इसी प्रकार सामके प्रतिष्ठागुण-का विधान करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है— |
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