भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 167

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १६१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
शङ्कासम्भवः। अतः कर्मापाये प्राणापत्तिर्भवति वा न वा? इत्याशङ्क्यते। तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थमाह—तद्धैतल्लोकजिदेवेति। तद्ध तदेतत्प्राणदर्शनं कर्मवियुक्तं केवलमपि, लोकजिदेवेति लोकसाधनमेव। न ह एवालोक्यतायै अलोकार्कत्वाय आशा आशंसनं प्रार्थनं नैवास्ति ह। न हि प्राणात्मनि उत्पन्नात्माभिमानस्य तत्प्राप्त्याशंसनं सम्भवति। न हि ग्रामस्थः कदा ग्रामं प्राप्नुयामित्यरण्यस्थ इवाशास्ते। असन्निकृष्टविषये ह्यनात्मन्याशंसनम्, न तत्स्वात्मनि सम्भवति। तस्मान्नाशास्ति कदाचित्प्राणात्मभावं न प्रपद्येयमिति।सम्भावना नहीं है। अतः अब यह शङ्का होती है कि कर्मके अभावमें [ केवल प्राणविज्ञानद्वारा ] प्राणात्मभावकी प्राप्ति होती है या नहीं? इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये श्रुति कहती है—‘तद्धैतल्लोकजिदेव’ अर्थात् वह यह प्राणविज्ञान कर्मसे रहित अकेला होनेपर भी लोकजित्—लोकप्राप्तिका साधन ही है। अलोक्यता अर्थात् लोकप्राप्तिकी अयोग्यताके लिये तो आशा—आशंसन अर्थात् प्रार्थना होती ही नहीं है। जिसे प्राणात्मामें आत्मत्वका अभिमान उत्पन्न हो गया है उसे उसकी प्राप्तिकी आशा होना सम्भव नहीं है; क्योंकि जो पुरुष गाँवमें मौजूद है वह वनस्थ पुरुषके समान ‘मैं कब गाँवमें पहुँचूँगा’—ऐसी आशा नहीं करता। अपनेसे दूर रहनेवाली अनात्मवस्तुके लिये ही ऐसी आशा हो सकती है, अपने आत्माके लिये उसका होना सम्भव नहीं है। अतः वह ‘कदाचित् मैं प्राणात्मभावको प्राप्त न होऊँ’ ऐसी आशंका नहीं करता।
कस्यैतत्? य एवमेतत्साम प्राणं यथोक्तं निर्धारितमहिमानंयह फल किसे प्राप्त होता है? जो इस प्रकार इस सामको अर्थात् ऊपर निश्चित हुई महिमावाले यथोक्त प्राणको

बृ० उ० ११—