बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ ब्राह्मण
ग्रन्थ-सम्बन्ध
| ज्ञानकर्मभ्यां समुच्चिताभ्यां प्रजापतित्वप्राप्तिर्व्याख्याता केवलप्राणदर्शनेन च 'तद्वैतल्लोकजिदेव' इत्यादिना। प्रजापतेः फलभूतस्य सृष्टिस्थितिसंहारेषु जगतः स्वातन्त्र्यादिविभूत्युपवर्णनेन ज्ञानकर्मणोर्वैदिकयोः फलोत्कर्षो वर्णयितव्य इत्येवमर्थमारभ्यते। तेन च कर्मकाण्डविहितज्ञानकर्मस्तुतिः कृता भवेत्सामर्थ्यात्। <br><br> विवक्षितं त्वेतत्—सर्वमप्येतज्ज्ञानकर्मफलं संसार एव, भयारत्यादियुक्तत्वश्रवणात्, कार्यकारणलक्षणत्वाच्च स्थूलव्यक्तानित्यविषयत्वाच्चेति। ब्रह्मविद्यायाः केवलाया वक्ष्यमाणाया मोक्षहेतु- | [तृतीय ब्राह्मणमें] समुच्चित ज्ञान और कर्मसे तथा 'तद्वैतल्लोकजिदेव' इत्यादि वाक्यद्वारा केवल प्राणविज्ञानसे भी प्रजापतित्वकी प्राप्तिका व्याख्यान किया गया। अब उनके फलभूत प्रजापतिकी, जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारमें, स्वतन्त्रतारूप विभूतिका वर्णन करके वैदिक ज्ञान और कर्मके फलोत्कर्षका वर्णन करना है, इसीलिये इस ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है। उस (फलोत्कर्षके वर्णन) से ही उसकी सामर्थ्यके कारण, कर्मकाण्डविहित ज्ञान और कर्मकी स्तुति हो जायगी। <br><br> कहना तो यह है कि यह ज्ञान और कर्मका सभी फल संसार ही है, क्योंकि इसका भय और अरति आदिसे युक्त होना सुना गया है, इसके अतिरिक्त यह कार्य-करणरूप है तथा स्थूल, व्यक्त और अनित्य-को विषय करनेवाला है। तथा अब कही जानेवाली केवल ब्रह्मविद्या मोक्षकी हेतु है—इस आगामी |