भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 189

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८३


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
च योनिभ्यामग्निं ब्राह्मणजातेरनुग्रहकर्तारमसृजत सृष्टवान् ।ब्राह्मण जातिपर अनुग्रह करनेवाले अग्निदेवको उत्पन्न किया ।
यस्माद्दाहकस्याग्नेर्योनिरेतदुभयं हस्तौ मुखं च, तस्मादुभयमप्येतदलोमकं लोमविवर्जितम् । किं सर्वमेव ? न, अन्तरतोऽभ्यन्तरतः; अस्ति हि योन्या सामान्यमुभयस्यास्य । किम् ? अलोमका हि योनिरन्तरतः स्त्रीणाम् । तथा ब्राह्मणोऽपि मुखादेव जज्ञे प्रजापतेः । तस्मादेकयोनित्वाज्ज्येष्ठेनेवानुजोऽनुगृह्यते अग्निना ब्राह्मणः । तस्माद्ब्राह्मणोऽग्निदेवत्यो मुखवीर्यश्चेति श्रुतिस्मृतिसिद्धम् ।क्योंकि ये हाथ और मुख दोनों दाह करनेवाले अग्निदेवकी योनि हैं । इसलिये ये दोनों ही लोमशून्य हैं। क्या सारे ही लोमशून्य हैं ? —नहीं, अन्तरतः —भीतरसे । इन दोनोंकी योनिसे समानता है । क्या समानता है ? स्त्रियोंकी योनि भी भीतरसे लोमशून्य ही होती है । इसी प्रकार ब्राह्मण भी प्रजापतिके मुखसे ही उत्पन्न हुआ है । अतः एक ही योनिसे उत्पन्न होनेवाले होनेसे जिस प्रकार बड़े भाईका छोटे भाईपर अनुग्रह रहता है उसी प्रकार अग्नि भी ब्राह्मणपर अनुग्रह करता है । अतः अग्नि ही ब्राह्मणकी देवता है और वह मुखरूप वीर्यवाला है—यह बात श्रुति-स्मृतिसिद्ध है ।
तथा बलाश्रयाभ्यां बाहुभ्यां बलभिदादिकं क्षत्रियजातिनियन्तारं क्षत्रियं च । तस्मादैन्द्रं क्षत्रं बाहुवीर्यं चेति श्रुतौ स्मृतौ चावगतम् । तथोरुत ईहा चेष्टाइसी प्रकार बलकी आश्रयभूता भुजाओंसे उसने क्षत्रियजातिके नियन्ता इन्द्रादि और क्षत्रियोंको रचा । इसीसे क्षत्रिय इन्द्रदेवताका अनुग्राह्य और बाहुरूप वीर्यवाला होता है—यह बात श्रुति और स्मृतिमें विख्यात है । तथा ईहा यानी चेष्टा उसके आश्रय-