भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 214
२०८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
ब्ध्यर्थत्वाच्च सृष्टिप्रवेशस्थित्यप्य-तथा सृष्टि, प्रवेश, स्थिति और
यवाक्यानाम्, उपलब्धेः पुरुषार्थ-लयका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य
त्वश्रवणात्। “आत्मानमेवावेत्”आत्मोपलब्धिके ही लिये हैं, क्योंकि
(बृ० उ० १।४।१०) “तस्मा-आत्मोपलब्धि ही पुरुषार्थ है—ऐसा
त्तत्सर्वमभवत्” (बृ० उ० १।सुना गया है; जैसा कि “उसने
४।१०) “ब्रह्मविदाप्नोतिअपनेहीको जाना,” “अतः वह
परम्” (तै० उ० २।१।१)सर्वरूप हो गया,” “ब्रह्मवेत्ता पर-
“स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेदमात्माको प्राप्त कर लेता है,” “वह
ब्रह्मैव भवति” (मु० उ० ३।जो कि उस परब्रह्मको जानता है
२।९) “आचार्यवान्पुरुषो वेद”ब्रह्म ही हो जाता है,” “आचार्यवान्
(छा० उ० ६।१४।२)पुरुषको ज्ञान होता है”, उसके
“तस्य तावदेव चिरम्” (छा०लिये तभीतक देरी है” इत्यादि
उ० ६।१४।२) इत्यादि-श्रुतियोंसे, तथा “तब मुझे तत्त्वतः
श्रुतिभ्यः। “ततो मां तत्त्वतोजानकर उसके पश्चात् मुझहीमें
ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्” (गीताप्रवेश करता है,” “वही समस्त
१८।५५) “तद्ध्यग्रयं सर्व-विद्याओंमें श्रेष्ठ है, क्योंकि उससे
विद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः”अमृतकी प्राप्ति होती है” इत्यादि
इत्यादिस्मृतिभ्यश्च। भेददर्शना-स्मृतियोंसे भी सिद्ध होता है। इसके
पवादाच्च सृष्ट्यादिवाक्यानाम्सिवा भेददर्शनकी निन्दा होनेसे भी
आत्मैकत्वदर्शनार्थपरत्वोपपत्तिः।सृष्ट्यादिविषयक वाक्योंका आत्मै-
तस्मात्कार्यस्थस्य उपलब्धृत्वमेवकत्वदर्शनपरक होना युक्त है। अतः
प्रवेश इत्युपचर्यते।कार्यस्थ आत्माका उपलब्ध होना ही
उसका प्रवेश है—ऐसा उपचारसे
कहा जाता है।
आ नखाग्रेभ्यो नखाग्रमर्यादम्‘आ नखाग्रेभ्यः’ अर्थात् नखाग्र-
आत्मनश्चैतन्यमुपलभ्यते। तत्रपर्यन्त आत्माका चैतन्य उपलब्ध होता