बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 217, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| क्तीति वाक्, पश्यंश्चक्षुश्चष्ट इति-चक्षुर्द्रष्टा, शृण्वञ्शृणोतीति श्रोत्रम्। | वाक् है, ‘चष्टे इति चक्षुः’ इस व्युत्पत्तिसे देखनेवाले यानी द्रष्टाका नाम चक्षु है और ‘शृणोतीति श्रोत्रम्’ इस व्युत्पत्तिसे जो सुनता है वह श्रोत्र है। |
| ‘प्राणन्नेव प्राणः’ ‘वदन्वाक्’ इत्याभ्यां क्रियाशक्त्युद्भवः प्रदर्शितो भवति। ‘पश्यंश्चक्षुः’ ‘शृण्वञ्श्रोत्रम्’ इत्याभ्यां विज्ञानशक्त्युद्भवः प्रदर्श्यते, नामरूपविषयत्वाद्धिज्ञानशक्तेः। श्रोत्रचक्षुषी विज्ञानस्य साधने, विज्ञानं तु नामरूपसाधनम्। न हि नामरूपव्यतिरिक्तं विज्ञेयमस्ति। तयोश्चोपलम्भे करणं चक्षुःश्रोत्रे। | ‘प्राणन्नेव प्राणः’, ‘वदन्वाक्’ इन दोनों वाक्योंसे आत्मामें क्रियाशक्तिका उद्भव दिखाया गया है तथा ‘पश्यंश्चक्षुः’, ‘शृण्वञ्श्रोत्रम्’ इन दोनों वाक्योंसे विज्ञानशक्तिका प्राकट्य प्रदर्शित किया गया है, क्योंकि विज्ञानशक्ति नाम और रूपको विषय करनेवाली होती है। श्रोत्र और नेत्र विज्ञानके साधन हैं तथा विज्ञान नाम-रूपका साधन है; क्योंकि नाम-रूपके सिवा और कोई विज्ञेय नहीं है तथा उनकी उपलब्धिमें नेत्र और श्रोत्र करण हैं। |
| क्रिया च नामरूपसाध्या प्राणसमवायिनी, तस्याः प्राणाश्रयाया अभिव्यक्तौ वाक्करणम्। तथा पाणिपादपायूपस्थाख्यानि। सर्वेषामुपलक्षणार्था वाक्। एतदेव हि सर्वं व्याकृतम्। “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” (बृ० उ० १।६।१) इति हि वक्ष्यति। | नाम और रूपसे साध्य जो क्रिया है वह प्राणके आश्रित है और उस प्राणाश्रिता क्रियाकी अभिव्यक्तिमें वाक् साधन है। इसी प्रकार पाणि, पाद, पायु और उपस्थ नामकी कर्मेन्द्रियाँ भी हैं। वाक् इन सबके उपलक्षणके लिये है। यही सब व्याकृत जगत् है। आगे “यह सारा नामरूप कर्म त्रयरूप ही है” इस श्रुतिसे यही बात कही जायगी। |