भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 219

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
विशेषणेन विशिष्ट इतरधर्मान्तरानुपसंहाराद्भवति । यावदयमेवं वेद पश्यामि शृणोमि स्पृशामीति वा स्वभावप्रवृत्तिविशिष्टं वेद तावदञ्जसा कृत्स्नमात्मानं न वेद।यानी एक-एक विशेषणसे विशिष्ट होता है। अतः जबतक यह 'मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं स्पर्श करता हूँ' इस प्रकार आत्माको स्वाभाविक प्रवृत्तियोंसे विशिष्ट जानता है तबतक यह साक्षात् रूपसे सम्पूर्ण आत्माको नहीं जानता।
कथं पुनः पश्यन्वेद ? इत्याह—तो फिर किस प्रकार देखनेपर वह उसे जानता है ? इसपर श्रुति कहती है—
(निरुपाधिकात्मोपासनमेव कृत्स्नत्वम्)<br>आत्मेत्येव, आत्मनि प्राणादीनि विशेषणानि यान्युक्तानि तानि यस्य स आप्नुवंस्तान्यात्मा इत्युच्यते । स तथा कृत्स्नविशेषोपसंहारी सन्कृत्स्नो भवति । वस्तुमात्ररूपेण हि प्राणाद्युपाधिविशेषक्रियाजनितानि विशेषणानि व्याप्नोति । तथा च वक्ष्यति— “ध्यायतीव लेलायतीव” (बृ० उ० ४ । ३ । ७) इति । तस्मादात्मेत्येवोपासीत ।'आत्मा है' इस प्रकार ही । आत्मा—ऊपर जिन प्राणादि विशेषणोंका वर्णन किया गया है, वे जिसके हैं, उन्हें व्याप्त करनेके कारण वह आत्मा कहा जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण विशेषणोंका अपनेमें उपसंहार करनेवाला होनेसे वह सम्पूर्ण है। वह अपने वस्तुमात्ररूपसे प्राणादि विशेष उपाधियोंकी क्रियासे होनेवाले विशेषणोंमें व्याप्त है। ऐसा ही “मानो ध्यान करता है, मानो चेष्टा करता है” इस वाक्यसे श्रुति कहेगी भी। अतः 'वह आत्मा है' इस प्रकार ही उसकी उपासना करनी चाहिये।
एवं कृत्स्नो ह्यसौ स्वेन वस्तुरूपेण गृह्यमाणो भवति । कस्मात्कृत्स्नः ? इत्याशङ्क्याह—अत्रा-इस प्रकार अपने वास्तविक स्वरूपसे ग्रहण किया जानेपर यह सम्पूर्ण है। क्यों सम्पूर्ण है ?—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—