बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 227, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २२१
| संस्कृत मूल | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| आत्मस्वरूपान्वाख्यानमात्रेण आत्मविज्ञाने विधिमन्तरेण न प्रवर्त्तत इति चेत् ? | पूर्व०—किंतु बिना विधिके केवल आत्मस्वरूपके अनुवादमात्रसे ही पुरुष आत्मविज्ञानमें प्रवृत्त नहीं हो सकता। |
| न, आत्मवादिवाक्यश्रवणेन आत्मविज्ञानस्य जनितत्वात्--किं भो कृतस्य करणम् ? तच्छ्रवणेऽपि न प्रवर्त्तत इति चेन्न, अनवस्थाप्रसङ्गात् । यथा आत्मवादिवाक्यार्थश्रवणे विधिमन्तरेण न प्रवर्त्तते तथा विधिवाक्यार्थश्रवणेऽपि विधिमन्तरेण न प्रवर्त्तिष्यत इति विध्यन्तरापेक्षा । तथा तदर्थश्रवणेऽपीत्यनवस्था प्रसज्येत । | सिद्धान्ती—ऐसा नहीं है क्योंकि आत्मविज्ञान तो आत्मवादी वाक्यके श्रवणमात्रसे ही उत्पन्न हो जाता है। फिर किये हुएको करनेका अर्थ ही क्या है ? यदि कहो कि [ विधिके बिना ] पुरुष उसे सुननेमें भी प्रवृत्त नहीं होता तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि इससे अनवस्थादोषका प्रसंग उपस्थित होता है। जिस प्रकार [ तुम्हारे मतानुसार ] पुरुष विधिके बिना आत्मवादी वाक्यके अर्थको श्रवण करनेमें प्रवृत्त नहीं होता, इसी प्रकार वह विधिके बिना विधिवाक्यार्थको श्रवण करनेमें भी प्रवृत्त नहीं होगा, इसलिये एक दूसरी विधिकी आवश्यकता होगी। इसी प्रकार उस विध्यन्तरका अर्थ श्रवण करनेमें भी अन्य विधिके बिना प्रवृत्त नहीं होगा—इस तरह अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। |
| वाक्यजनितात्मज्ञानस्मृतिसंततेः श्रवणविज्ञानमात्रादर्थान्तरत्वमिति चेत् ? | पूर्व०—तो भी श्रवणविज्ञानमात्रसे वाक्यजनित आत्मज्ञानकी स्मृतिका प्रवाह तो दूसरी ही चीज है ? |