बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 267, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 267
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६१
| संस्कृत | हिन्दी |
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| द्रष्टा, सर्वथापि द्रष्टैव। द्रष्टव्य एव तु भवान्विशेषमाह दृष्टेर्द्रष्टेति द्रष्टा तु यदि दृष्टेः, यदि वा घटस्य, द्रष्टा द्रष्टैव। | तरहसे द्रष्टा ही रहा। दृष्टिका द्रष्टा कहकर तो आप केवल द्रष्टव्यमें ही विशेषता बतलाते हैं। द्रष्टा तो चाहे दृष्टिका हो चाहे घटका, द्रष्टा द्रष्टा ही है। |
| न, विशेषोपपत्तेः। अस्त्यत्र विशेषः—दृष्टेर्द्रष्टा स दृष्टिश्चेद्भवति नित्यमेव पश्यति दृष्टिम्, न कदाचिदपि दृष्टिर्न दृश्यते द्रष्ट्रा; तत्र द्रष्टुर्दृष्ट्या नित्यया भवितव्यम्, अनित्या चेद् द्रष्टुर्दृष्टिः, तत्र दृश्या या दृष्टिः सा कदाचिन्न दृश्येतापि, यथानित्यया दृष्ट्या घटादि वस्तु। न च तद्वद् दृष्टेर्द्रष्टा कदाचिदपि न पश्यति दृष्टिम्। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि घटद्रष्टा और दृष्टिद्रष्टाका भेद सम्भव है। यहाँ एक भेद है—जो दृष्टिका द्रष्टा है वह, यदि दृष्टि होती है तो, उसे नित्य ही देखता है। ऐसा नहीं होता कभी द्रष्टाको दृष्टि न भी दिखायी पड़े। उस अवस्थामें द्रष्टाकी दृष्टि नित्य होनी चाहिये। यदि द्रष्टाकी दृष्टि अनित्य होगी तो उसकी दृश्यभूता जो दृष्टि है वह कभी नहीं भी देखी जायगी, जैसे कि अनित्य दृष्टिसे घटादि वस्तु। किंतु उसके समान दृष्टिका द्रष्टा कभी दृष्टिको न देखता हो—ऐसी बात नहीं है। |
| किं द्वे दृष्टी द्रष्टुः—नित्या अदृश्या, अन्या अनित्या दृश्येति ? | पूर्व०—तो क्या द्रष्टाकी दो दृष्टियाँ हैं—एक नित्य और अदृश्य तथा दूसरी अनित्य और दृश्य ? |
| बाढम्; प्रसिद्धा तावदनित्या दृष्टिः, अन्धानन्धत्वदर्शनात्। नित्यैव चेत्सर्वोऽनन्ध एव | सिद्धान्ती—हाँ, लोकमें अन्धत्व और अनन्धत्व दोनों देखे जानेसे अनित्य दृष्टि तो प्रसिद्ध ही है। यदि यह दृष्टि नित्य ही होती तो सब अनन्ध (नेत्रवान्) ही होते। |