बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 269, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 269
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६३
| संस्कृत | हिन्दी |
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| विज्ञातारं विजानीयाः” ( बृ० उ० ३ । ४ । २ ) इति श्रुतेः, विज्ञातुर्विज्ञानम् । | विज्ञाताको तुम नहीं जान सकते" ऐसी श्रुति होनेसे विज्ञाता (आत्मा) को जानना तो विरुद्ध कथन जान पड़ता है। |
| न, एवं विज्ञानान्न विप्रतिषेधः । एवं दृष्टेर्द्रष्टेति विज्ञायत एव । अन्यज्ञानानपेक्षत्वाच्च— | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है। इस प्रकारके विज्ञानसे इस श्रुतिका विरोध नहीं होता। 'वह दृष्टिका द्रष्टा है' इस प्रकार तो वह जाना ही जाता है। इसके सिवा अन्य ज्ञानकी अपेक्षा न होनेके कारण भी [ इस कथनमें विरोध नहीं है ]। |
| न च द्रष्टुर्नित्यैव दृष्टिरित्येवं विज्ञाते द्रष्टृविषयां दृष्टिमन्यामाकाङ्क्षते । निवर्तते हि द्रष्टृविषयदृष्ट्याकाङ्क्षादसम्भवादेव। न ह्यविद्यमाने विषय आकाङ्क्षा कस्यचिदुपजायते। न च दृश्या दृष्टिर्द्रष्टारं विषयीकर्तुमुत्सहते, यतस्तामाकाङ्क्षेत। न च स्वरूपविषयाकाङ्क्षा स्वस्यैव। तस्मादज्ञानाध्यारोपणनिवृत्तिरेव 'आत्मानमे- | द्रष्टाकी दृष्टि नित्या ही है—ऐसा ज्ञान हो जानेपर उस दृष्टिको विषय करनेवाली किसी अन्य दृष्टिकी अपेक्षा नहीं होती। बल्कि इससे तो द्रष्टाको विषय करनेवाली दृष्टिकी आकाङ्क्षा निवृत्त हो जाती है, क्योंकि उसका होना असम्भव ही है। जो वस्तु विद्यमान नहीं होती उसके लिये किसीकी आकाङ्क्षा नहीं हुआ करती। कोई भी दृश्यभूता दृष्टि द्रष्टाको विषय करनेमें समर्थ नहीं है, जिससे कि उसकी आकाङ्क्षा की जाय और अपने स्वरूपके विषयमें अपने ही आकाङ्क्षा हुआ नहीं करती। अतः 'आत्माको जाना' इस वाक्यसे अज्ञानके आरोपकी निवृत्तिका ही निरूपण |