बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 291, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २८५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| सूत्रितः शास्त्रार्थः ‘आत्मत्येवोपासीत’ इति । तस्य च व्याचिख्यासितस्य सार्थवादेन “तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया” इत्यादिना सम्बन्धप्रयोजने अभिहिते । अविद्यायाश्च संसाराधिकारकारणत्वमुक्तम् “अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते” इत्यादिना । तत्राविद्वानृणी पशुवद्देवादि कर्मकर्तव्यतया परतन्त्र इत्युक्तम् ।<br><br>किं पुनर्दैवादिकर्मकर्तव्यत्वे निमित्तम् ? वर्णा आश्रमाश्च । तत्र के वर्णाः ? इत्यत इदमारभ्यते। यन्निमित्तसम्बद्धेषु कर्मस्वयं परतन्त्र एवाधिकृतः संसारीति ।<br><br>एतस्यैवार्थस्य प्रदर्शनायाग्निसर्गानन्तरमिन्द्रादिसर्गो नोक्तः। अग्नेस्तु सर्गः प्रजापतेः सृष्टिपरिपूरणाय प्रदर्शितः। अयं च इन्द्रादिसर्गस्तत्रैव द्रष्टव्यस्तच्छेष- | ‘आत्मत्येवोपासीत’ इस वाक्यसे शास्त्रके तात्पर्यका सूत्ररूपमें संक्षेपसे वर्णन किया गया । फिर “तद्यो यो देवानां प्रत्यबुद्ध्यत” इत्यादि अर्थवादके सहित “तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया” इत्यादि मन्त्रवाक्यद्वारा व्याख्या करनेके लिये अभीष्ट उस शास्त्रार्थके सम्बन्ध और प्रयोजन बतलाये गये, तथा “अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते” इत्यादि वाक्यसे अविद्याको संसारोत्पत्तिमें कारण बताया । वहाँ यह कहा गया है कि अज्ञानी ऋणी होता है; अर्थात् पशुके समान देवकर्मादिकी कर्तव्यतासे युक्त होनेके कारण परतन्त्र होता है ।<br><br>किंतु देवादि कर्मोंकी कर्तव्यतामें कारण क्या है ? वर्ण और आश्रम । उनमें, जिस वर्णरूप निमित्तसे सम्बद्ध कर्मोंमें इस परतन्त्र संसारी जीवका ही अधिकार है, वे वर्ण कौन-से हैं?— ऐसा प्रश्न होनेपर यहाँसे आरम्भ किया जाता है। इस अर्थको प्रदर्शित करनेके प्रयोजनसे ही अग्निसर्गके पश्चात् इन्द्रादि सर्गका वर्णन नहीं किया। अग्निसर्गको तो प्रजापतिकी सृष्टिकी सब प्रकार पूर्ति करनेके लिये प्रदर्शित किया था। प्रजापति सर्गका शेषभूत होनेके कारण इस इन्द्रसर्गको वहीं (उसीके अन्तर्गत) समझना |